शीतल की शादी से सुर्खियों में आए ग्राम निजामपुर में होने वाली बेटियों की शादी की अपनी परंपरा रही है। गांव में रहने वाली किसी भी जाति में बेटी की शादी होने पर दूल्हा हमेशा जनमासे से घोड़ी पर चढ़कर दुल्हन के दरवाजे पर बैंडबाजे के साथ पहुंचते रहे है। दूसरी जाति के लोगों ने कभी भी शादी में व्यवधान डालने का प्रयास नहीं किया।
ग्राम निजामपुर बैसे तो ठाकुर बाहुल्य गांव है, लेकिन इस गांव में कुशवाह, कढ़ेरे, जाटव, बाल्मीकि एवं मुस्लिम समाज के लोग रहते हैं। इन जातियों में अब तक तमाम बेटियों की शादियां होती रही हैं। इन शादियों में बारात चढ़ने की अपनी परंपरा है। किसी भी जाति की बारात ने कभी भी पूरे गांव में भ्रमण नहीं किया। एक निश्चित मार्ग से होकर बारात चढ़ती रही हैं। दूसरी जाति के लोगों ने कभी भी शादी में किसी भी प्रकार का व्यवधान नहीं डाला।
ठाकुर जाति के राम प्रकाश कहते हैं कि कहते हैं कि उनके एक बेटा व दो बेटी हैं। शादी के दौरान गांव में हर बेटी की बारात उसके दरवाजे तक पहुंचती रही है। उनकी जाति के लोगों ने भी कभी पूरे गांव में बारात का भ्रमण नहीं कराया। ज्ञान सिंह कुशवाह कहते हैं कि उनके 4 बेटे व 2 बेटियों हैं। उनका घर गांव के आखिरी छोर पर है। वे अपनी दो बेटियों की शादी कर चुके हैं। बेटियों की शादियों में बारात उनके दरवाजे पर राजी खुशी पहुंची। कभी किसी ने विरोध नहीं किया। इसी जाति की मोहन देवी कहती हें कि वे अपनी 7 बेटियों की शादियां बिना किसी व्यवधान के कर चुकी हैं। कढ़ेरे समाज के नेम सिंह कहते हैं कि गांव में बारात ने कभी पूरे गांव का भ्रमण नहीं किया। उनके 3 बेटे व 2 बेटी हैं। वे अपनी एक बेटी की शादी कर चुके हैं। उनके घर तक आने वाले रास्ते से पहले कई ठाकुर जाति के घर हैं। बेटी की बारात धूमधाम से उनके दरवाजे तक पहुंची। जलालुद्दीन सैफी कहते हैं कि उनके दो बेटी व 3 बेटियां है। अब तक दो बेटियों की उन्होंने शादी की है। बारात चढ़ाने में कभी दिक्कत नहीं आई।