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मिलावट का खेल

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फिरोजाबाद। यूं तो त्योहार उमंग और उल्लास लेकर आते हैं, लेकिन इन मौकों पर मिलावट करने वाले स्वाद को किरकिरा कर देते हैं। सामान्य दिनों में जहां जिले में 20 से 25 क्विंटल मावा की खपत रोजाना होती है। वहीं दीवाली पर त्योहार से पहले ही यह मांग हर रोज 50 क्विंटल तक पहुंच जाती है। चांदी के बर्क की जगह एल्यूमिनियम का लगाया जाता है।
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रंग-बिरंगी मिठाइयों में हलवाई होली के रंग एवं रसायन को मिलाते हैं। जो कैंसर जैसी बीमारी पैदा कर सकता है। सबसे अधिक दूध में मिलावट की जा रही है। हाल ही में कई नमूने फेल भी हुए हैं और दुकानदारों पर जुर्माना भी लगाया गया है।

इस तरह करें पहचान
हथेली पर मावा की गोली बनाएं। अगर यह फटने लगे तो नकली है।
- मावा को गरम पानी में घोल लें और इसे ठंडा होने दें। फिर इसमें आयोडीन सॉल्यूशन डालें। मावा नकली होगा तो इसका रंग नीला हो जाएगा।
- नकली मावा चिपचिपा और चखने पर इसका स्वाद कसैला होता है।
- मिलावटी और सिंथेटिक पनीर खाने में रबड़ की तरह खिंचता है।
- असली पनीर सब्जी बनाने के दौरान टूटता नहीं है।

नकली और मिलावटी दूध निर्मित उत्पाद सेहत के लिए घातक हैं। इनसे उल्टी-दस्त, उदर संक्रमण, बदहजमी, गैस सहित त्वचा रोग भी हो सकते हैं। यही नहीं लगातार सेवन से किडनी और लिवर पर भी बुरा असर पड़ता है।
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