एटा। तीन तलाक के मुद्दे को लेकर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुस्लिम समुदाय ने खुशी से इस्तकबाल किया। समाज के लोगों ने कोर्ट के शरीयत में दखल नहीं देने पर सहमति जताई। साथ ही कानून बनाने के निर्देश को भी सही ठहराया। शहर के सिविल लाइंस पर मुस्लिम अधिवक्ताओं ने कोर्ट के फैसले को लेकर चर्चा की। पूरे दिन शहर में तीन तलाक का मुद्दा छाया रहा।
दायरे में रहकर बने कानून
अधिवक्ता मोहम्मद इरफान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने शरीयत में दखल नहीं दी है। कोर्ट ने कहा है कि तीन तलाक को शरीयत में रहकर लागू किया जा सकता है। वे कहते हैं कि सरकार शरीयत के दायरे मेें रहकर कानून बनाए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान
अधिवक्ता महबूब अली कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। कोर्ट ने छह माह के लिए जो रोक लगाई है, इससे सहमत हैं। मगर सरकार को इस वक्त में ही कानून तैयार करना होगा।
शरीयत की हिफाजत सबसे अहम
अधिवक्ता मोहम्मद यासीन ने कहा कि शरीयत की हिफाजत करना सबसे अहम है। सरकार को शरीयत का ख्याल करते हुए तीन तलाक को लेकर कानून बनाना चाहिए। तभी कुछ संभव हो सकेगा।
कानून को समझने की जरूरत
अधिवक्ता शाहिद हुसैन ने कहा कि तीन तलाक के मुद्दे को तूल देना गलत है। मुस्लिम समाज में दहेज हत्या कम होती हैं, इसका कारण तीन तलाक है। कोई भी तलाक मजबूरी में ही लेता है। कानून को समझने की जरूरत है।
कोर्ट ने बिल्कुल सही किया
अधिवक्ता मोहम्मद फरमान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सही सुनाया है। तीन तलाक पर कानून बनने से जो महिलाएं परेशान हैं या जिनका अहित हुआ है, उनको न्याय मिल सकेगा।
महिलाएं बोली: कोर्ट ने दिलाया हक
पवांस की आबदा बेगम ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। कोर्ट ने महिलाओं को उनका हक दिलाया है।
शगुफ्ता आलम कहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने जो भी फैसला सुनाया है, वह सही है। सरकार को कानून बनाने में शरीयत का ख्याल रखना चाहिए।
सलमा बेगम ने कहा कि तीन तलाक पर कानून बनने से महिलाओं को न्याय मिलेगा। महिलाओं को उनका हक मिलेगा।
इनका कहना है
कोर्ट के फैसले का इस्तक बाल करते हैं। कोर्ट ने शरीयत में कोई दखल नहीं की है। तीन तलाक का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। शरीयत के हिसाब से ही कानून बनाया जाए।
मौलाना सिबतैन हैदर, मारहरा
कानून बनाने के लिए सरकार को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से बात करनी चाहिए। कोर्ट ने तीन तलाक को लेकर जो टिप्पणी की है, उससे शरीयत की हिफाजत हुई है। शरीयत में दखल बर्दाश्त नहीं करेंगे।
बदूद मियां, शहर काजी
कासगंज।
तीन तलाक के मामले में सुप्रीम कोर्ट के कानून बनाने के निर्देशों को लेकर जिले के मुस्लिम समाज के लोगों की मिली जुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं हैं। सभी लोग सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का स्वागत और सम्मान कर रहे हैं। लेकिन वे चाहते हैं जब कानून बनाया जाए तो इसके लिए मुस्लिम पर्सनल बोर्ड और शरीयत को नजरअंदाज न किया जाए। मुस्लिम पर्सनल बोर्ड एवं धर्म गुरुओं को विश्वास में लेकर ऐसा सर्वसम्मत कानून बने जिसे हर कोई स्वीकार करे।
- तीन तलाक के मामले में उच्चतम न्यायालय के आदेश का हम सम्मान करते हैं। हमें आशा है कि मुस्लिम महिलाओं की हित में अच्छा होगा। वही अन्य समाज के लोग जो महिलाओं को छोड़ बैठे हैं वह कैसे महिलाओं के हितैषी हो सकते हैं। डा. इस्लाम फारूकी, सचिव ऑल इंडिया जमात ए सबबात
- सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हैं। सरकार बहुमत से धार्मिक मान्यताओं को ध्यान में रखकर अच्छा कानून बनाए। इससे मुस्लिम समाज की महिलाओं को लाभ मिले। डा. लाइक अली
- कोर्ट का फैसला अच्छा है। तमाम महिलाएं तीन तलाक को लेकर परेशान हैं। सरकार जब कानून बनाएगी तो महिलाओं को लाभ मिलेगा।
अब्दुल हफीज उर्फ लद्दन
- मुस्लिम समाज सुप्रीम कोर्ट के फैसले का कानून का स्वागत करता है। मुस्लिम पर्सनल बोर्ड व अन्य धार्मिक गुरुओं को विश्वास में लेकर कानून बनाया जाए। जो सर्वसम्मति से सभी को स्वीकार हो। डा. फारूख अहमद
- हिंदुस्तान के संविधान में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी नुमाइंदगी करता है। सर्वसम्मति से कानून बने इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए। धार्मिक बिंदु नजरअंदाज भी न हों। नजमा नाज पूर्व सभासद
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सम्मान है, लेकिन शरीयत को भी नजर अंदाज नहीं कर सकते। शरीयत में तीन तलाक मान्य है। मुहम्मद ताहिर गुफरानी
- उच्चतम न्यायालय के आदेश का हम सम्मान करते हैं। हमें पूरी उम्मीद है कि मजहब के बनाए कानून को भी ध्यान में रखकर कानून बनाया जाएगा। मौलाना जेद मदनी
- देश के सर्वोच्च न्यायालय पर गर्व है, लेकिन न्यायालय को मुस्लिमों से जुड़े मामले मुस्लिम पर्सनल बोर्ड को सौंप देने चाहिए। मजहब से जुड़े सारे फैसले कुरान हदीस की रोशनी में हो। मुफ्ती बिलाल कासमी
- सुप्रीम कोर्ट का तीन तलाक के मामले में कानून बनाने का निर्देश अच्छा है। महिलाओं के बारे में सोचा गया है। वैसे तो इस्लाम के सारे फैसले बेहतर हैं, लेकिन तलाक के फैसले में अगर देश का कानून जुड़ जाएगा तो बेहतर होगा। सोनी कुरैशी
- तलाक देना कोई हंसी खेल नहीं है। इस्लाम की मान्यताओं में बहुत ताकत है। बस हम उन्हें हल्के में लेते हैं। देश के कानून का हम सम्मान करते हैं। अख्तरी बेगम
- तीन तलाक के मुद्दे पर सरकार कानून बनाएगी। इसी तरह से हर गलत मुद्दे को उठाया जाए। केंद्र सरकार लोगों को मुद्दो में उलझाकर न रखे। रहीसा बेगम
- तलाक शब्द महिलाओं को परेशान करने वाला है। इस पर कानून बनेगा तो अच्छा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अच्छे हैं, लेकिन कानून में धार्मिक भावनाओं को नजरअंदाज न किया जाए। फिरदोस