मैनपुरी। सियासी जमीन बचाने के लिए मैनपुरी में मुलायम ने हर बार नया दांव खेला। कई राजनीतिक फैसले लिए। सन् 1989 से मैनपुरी मुलायम का गढ़ है। मुलायम के गढ़ को भेदने के लिए भाजपा और बसपा ने हर बार कवायद की, लेकिन सफलता इन दलों से कोसों दूर ही रही। मैनपुरी को मुलायम के लिए सबसे सुरक्षित सीट माना जाता है।
1984 में कांग्रेस के हाथों हार का सामना करने वाले मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 1989 के बाद से हर बार नया दंाव खेला है। सियासी जमीन बचाए रखने के लिए कभी जोखिम नहीं लिया। मतदाताओं की नाराजगी भांपकर प्रत्याशी बदलने तक का निर्णय लेने से नहीं हिचकिचाए।
मुलायम हमेशा मैनपुरी को अपनी कर्मभूमि बताकर अभेद दुर्ग बनाने में लगे रहे। मैनपुरी के लिए प्रत्याशी चयन करते समय उन्होंने कभी किसी से समझौता नहीं किया। मैनपुरी आने के दौरान वह कार्यकर्ताओं और पुराने सहयोगियों से सांसद का रिपोर्ट कार्ड लेना नहीं भूले।
कार्यकर्ताओं के सामने ही संासद को हिदायत देना उनकी आदत में शामिल रहा है। हर चुनावी सभा और कार्यकर्ता बैठकों में खुलेआम कहते रहे इटावा मेरी जन्मभूमि है, लेकिन मैनपुरी मेरी कर्मभूमि है। जैन इंटर कॉलेज करहल में शिक्षण कार्य केे दौरान उनके जो संबंध मैनपुरी के लोगों से बने उनकी बदौलत ही मैनपुरी आज तक उनका अभेद किला बना हुआ है।
नाम मुलायम निर्णय लेने में रहे कठोर
मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 2004 में सांसद चुने गए अपने भतीजे धर्मेंद्र यादव को 2009 में टिकट काट दिया। कार्यकर्ताओं में धर्मेंद्र का विरोध था। 2009 में मुलायम खुद मैनपुरी से चुनाव लड़े। वर्ष 2014 में सीट छोड़ने केे बाद हुए उप चुनाव में अपने पौत्र तेजप्रताप सिंह यादव को चुनाव लड़ाया। उनका रिपोर्ट कार्ड अच्छा नहीं पाकर एक बार फिर 2019 में मुलायम ने मैनपुरी से चुनाव लड़ने का एलान किया।
मुलायम ने इन्हें चुना था प्रत्याशी
वर्ष प्रत्याशी
1984 रवींद्र सिंह चौहान (लोकदल)
1989 उदय प्रताप सिंह (जनता दल)
1991 उदय प्रताप सिंह (सजपा)
1996 मुलायम सिंह यादव (सपा)
1998 बलराम सिंह यादव (सपा)
1999 बलराम सिंह यादव (सपा)
2004 मुलायम सिंह यादव (सपा)
2004 उपचुनाव धर्मेंद्र यादव (सपा)
2009 मुलायम सिंह यादव (सपा)
2014 मुलायम सिंह यादव (सपा)
2014 उपचुनाव तेजप्रताप सिंह यादव