ज्योत्यवेंद्र दुबे
मैनपुरी। मुलायम के गढ़ की सियासी जंग में हाथी तो पहले ही साइकिल का साथी बन गया है, लेकिन अब कांग्रेस के हाथ ने भी सपा का साथ दे दिया है। कांग्रेस हाईकमान ने मैनपुरी सीट से उम्मीदवार नहीं उतारने का निर्णय लिया है।
इस फैसले के बाद सपा की जीत में अब केवल भाजपा ही राह का रोड़ा है। ऐसे में चुनावी चर्चाओं ने भी जोर पकड़ लिया है। एक ओर जहां सपा-बसपा खुश है, वहीं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं में मायूसी है।
मैनपुरी को मुलायम सिंह का गढ़ कहा जाता है। चार बार मुलायम सिंह यादव यहां से सांसद चुने गए। उनके सामने किसी भी विरोधी का कोई पैंतरा काम नहीं आया। पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने पौत्र तेजप्रताप यादव के लिए सीट छोड़ दी थी, लेकिन इस बार फिर चुनाव में उन्होंने दो-दो हाथ करने का ऐलान कर दिया है।
सूबे में सपा-बसपा का गठबंधन होने के बाद हाथी की सवारी करने वाले जहां अब साइकिल को धक्का लगा रहे हैं तो वहीं कांग्रेस हाईकमान ने भी मैनपुरी में प्रत्याशी नहीं उतारने का निर्णय लिया है। ऐसे में एक ओर जहां सपा-बसपा खुश है, वहीं, कांग्रेस कार्यकर्ताओं में मायूसी है।
जिले में वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस की सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया है। अब केवल मुलायम की राह में केवल कमल ही रोड़ा है। हालांकि अब तक भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। सूत्रों के अनुसार भाजपा प्रत्याशी को लेकर अब भी मंथन करने में जुटी हुई है, लेकिन फिर भी कहीं न कहीं सपा के गढ़ में मुलायम सिंह ने एक कदम और बढ़त बना ली है।
कभी कायम थी कांग्रेस की बादशाहत
जिले में कांग्रेस का वजूद हमेशा से खतरे में नहीं था। कभी यहां भी कांग्रेस की ही बादशाहत चलती थी। पहले चुनाव से लेकर 1984 के चुनाव तक कांग्रेस यहां हारती-जीतती आई। 1984 के बाद से मैनपुरी में कांग्रेस का सूरज हमेशा के लिए अस्त हो गया।
तीन चुनावों से नहीं उतारा प्रत्याशी
कांग्रेस ने जिले में तीन चुनावों से कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है। आखिरी बार वर्ष 2004 में पार्टी ने प्रत्याशी को चुनाव लड़ाया था। इसके बाद से वर्ष 2009, 2014 व उप चुनाव 2014 में पार्टी हमेशा समर्पण करती आई है। इस बार भी पार्टी ने प्रत्याशी न उतारकर बिना जंग के ही घुटने टेक दिए हैं।
तीसरे नंबर पर भी नहीं आ सकी कांग्रेस
कांग्रेस से आखिरी बार वर्ष 1984 में बलराम सिंह यादव लोकसभा पहुंचे थे। इसके बाद फिर पार्टी कभी तीसरे नंबर पर भी नहीं आ सकी। हमेशा भाजपा या बसपा ही दूसरे व तीसरे स्थान पर रहीं। ऐसे में धीरे-धीरे कांग्रेस का अस्तित्व खतरे में पड़ता चला गया।