मैनपुरी। मैनपुरी की सियासी जमीन पर दूसरों ने वोटों की फसल खूब काटी है। यहां की जनता अपनों से ऐसी रूठी कि 52 सालों से जिले का कोई भी लोकसभा प्रत्याशी संसद की सीढ़ियां नहीं चढ़ सका है। हर बार जनता ने स्थानीय उम्मीदवारों के बजाय दूसरे जिलों के प्रत्याशियों पर ही भरोसा जताया है। अब तक चुने गए 16 सांसदों में से महज एक ही प्रत्याशी को दो बार संसद तक पहुंचने का मौका मिला है।
पहले और तीसरे लोकसभा चुनाव को अगर छोड़ दें, तो इसके बाद से हर बार लोकसभा चुनाव में जीत का ताज गैर जनपदों के निवासी प्रत्याशियों के सिर पर ही सजा। वर्ष 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में बादशाह गुप्ता सांसद चुने गए थे। वे कुसमरा क्षेत्र के गांव रामनगर के निवासी थे।
तीसरी लोकसभा में भी उन्होंने मैनपुरी से जीत हासिल की। इसके बाद फिर कभी मैनपुरी सांसद की कुर्सी पर कोई अपना नहीं बैठ सका। हर बार यह मौका दूसरे जनपदों के उम्मीदवारों की ही दिया गया। इसे सियासी समीकरण कहें या फिर प्रत्याशियों की किस्मत, लेकिन इतना जरूर है कि कहीं न कहीं मैनपुरी की जनता ने अपनों को ठुकरा कर गैरों पर भरोसा किया है।
हर चुनाव लड़े मैनपुरी के प्रत्याशी
ऐसा नहीं है कि मैनपुरी के प्रत्याशियों ने लोकसभा चुनाव में कभी ताल न ठोकी हो। पहले चुनाव से लेकर अब तक हर बार राजनीतिक दलों ने भी मैनपुरी के प्रत्याशी पर दाव लगाया, लेकिन हर बार उन्हें हार का ही सामना करना पड़ा।