शहीदों की शहादत को भूल बैठा प्रशासन
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एटा/जैथरा। देश की खातिर अपनों को भुलाकर कारगिल युद्ध में खून बहाने वाले शहीदों को अब सब भुला चुके हैं। वर्ष 1998-99 में हुए युद्ध में एटा के दो वीर सपूतों ने भी पाक सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए पटखनी दी थी और देश की खातिर दुश्मनाें से लड़ते-लड़ते शहीद हो गए थे। यूं तो शहादत के बाद परिवारों को पेट्रोल पंप और अन्य सुविधाएं दीं गईं, लेकिन इसके बाद किसी ने परिवारों की सुध हीं। एक शहीद की जहां सालों बीतने के बाद भी न तो कोई प्रतिमा लगी और न ही शहीद की समाधि स्थल तक पहुंचने के लिए रास्ता मिला। वहीं दूसरे शहीद की प्रतिमा की बेकदरी हो रही है। कैप्टन सुनील यादव के घर तक जाने का रास्ता कच्चा है। आइए डालते हैं एक नजर...
प्रतिमा लगी नहीं, सुविधा भी नहीं
गांव घिलौआ निवासी शहीद पुष्पेंद्र यादव मात्र 22 साल की उम्र में ही फौज में भर्ती होकर देश की सेवा में लग गया था। कारगिल युद्ध के दौरान वो जम्मू कश्मीर में तैनात था, लेकिन 30 अगस्त,1999 को पुष्पेंद्र यादव पाक सैनिकों को मुंहतोड़ जवाब देते हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा पर शहीद हो गए। पुष्पेंद्र यादव की शहादत के 19 साल बाद भी परिवार मदद को तरस रहा है। प्रशासन आज तक शहीद पुष्पेंद्र की गांव में प्रतिमा नहीं लगवा पाया। साथ ही शहीद की चौखट तक पहुंचने वाले रास्ते का निर्माण तक नहीं हुआ। पुष्पेंद्र की मां का देहंात हो चुका है, लेकिन पिता शोभाराम यादव शहीद बेटे की प्रतिमा लगवाने और रास्ता बनवाने को लेकर प्रशासन की राह देख थक चुके हैं। पिता का कहना है कि शहीद होने के बाद न तो आर्मी के जवानों तक ने कभी सुध ली और न ही प्रशासन हाल पूछने आया। हालांकि शहीद के नाम पर मिले पेट्रोल पंप का संचालन बड़े भाई करते हैं। पिता को पेंशन मिलती है, लेकिन मूलभूत सुविधाओं का अभाव परिवार को सालता है।
रास्ता कच्चा, स्मारक बेहाल
कारगिल युद्ध में शहीद होने वाले एक और जवान कैप्टन सुनील यादव की शहादत भी दरकिनार कर दी गई है। कैप्टन के पैतृक गांव कठिंगरा में समस्याओें का अंबार है। लाडले के शहीद होने के बाद परिवार को पेट्रोल पंप मिला और मां शकुंतला को पेंशन मिलने लगी। इसके बाद परिवार आगरा में रहने लगा, लेकिन माटी के लाल को प्रशासन ने भुला दिया। शहीद के परिवार ने खुद ही स्मारक बनवाया। आलम यह है कि स्मारक पर लगे बिजली के खंभे और तार उखड़ चुके हैं। वहीं शहीद के घर तक जाने वाला रास्ता भी कच्चा है। हर वर्ष गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर परिवार के लोग ही श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं, लेकिन प्रशासन ने कोई सुध नहीं ली। चाचा वीरपाल सिंह बताते हैं कि शहीद के गांव में कोई नहीं आता।
सैनिक कल्याण बोर्ड भी नहीं करता पहल
जिले में भूतपूर्व सैनिकों की सुविधा के लिए सैनिक कल्याण बोर्ड गठित किया गया है, लेकिन वहां भी सैनिकों की समस्याएं हल नहीं हो पातीं। शहीदों की प्रतिमाओं के निर्माण को लेकर बोर्ड को जानकारी नहीं है।