शहीद द्वार बनवाने भटक रहे तो किसी की प्रतिमा के आगे गंदगी के ढेर
कारगिल के शहीदों की अनदेखी, सिर्फ आश्वासन ही मिले, पूरे नहीं हुए
अमर उजाला ब्यूरो
मैनपुरी।
वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में देश की सीमा पर शहादत देने वाले जिले के सैनिकों को शासन और प्रशासन भूल चुका है। शहीदों के परिवारीजनों की समस्याओं का समाधान कराने का अधिकारियों के पास वक्त ही नहीं है। किसी के परिवारीजन शहीद द्वार बनवाने के लिए चक्कर लगा रहे हैं तो किसी का स्मारक बना है लेकिन उसके पास गंदगी पड़ी है इसकी सुध किसी को नहीं है।
बुधवार को कारगिल दिवस है। बिछवां क्षेत्र के अंजनी निवासी शहीद प्रवीन यादव के परिवारीजनों का कहना है गांव में शहीद द्वार बनवाने के लिए वह चार साल से अधिकारियों के चक्कर लगा रहे हैं। कभी लोक निर्माण विभाग तो कभी एसडीएम कार्यालय से उनको केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं। वह शहीद द्वार का निर्माण निजी खर्चे पर कराना चाहते हैं। तब यह हालत है। शहीद की पत्नी सुमन यादव कहती हैं कि शहीद परिवारों की समस्याओं का निराकरण नहीं होता है। पिता जगदीश यादव कहते हैं शहादत के समय भरोसा देने वाले नेता और अधिकारी गांव में दोबारा हाल चाल जानने तक के लिए नहीं आए हैं। शहीद के माता पिता अंजनी में तथा पत्नी और बच्चे शहर में रहते हैं।
बेवर के गांव गढ़िया घुटारा निवासी शहीद मुनीश कुमार यादव के पिता वेदराम सिंह तथा मां सुशीलादेवी गांव में रहती हैं। पत्नी मंजूदेवी भरथना में बच्चों के साथ रहती हैं। वह भरथना में ही गैस एजेंसी का संचालन करती हैं। शहीद के पिता का कहना है शहीद परिवारों को सम्मान देने का दावा करने वाले नेताओं की असलियत सामने आ चुकी है।
औंछा क्षेत्र के नगला आंध्रा निवासी हेमचरन यादव के परिवार की भी कुछ यही कहानी है। पिता रामवृत्रा का कहना है शासन ने शहीद की याद में गांव में कालेज खोलने की बात कही थी। उन्होंने जमीन की व्यवस्था कर ली मगर अब अधिकारी सुनवाई नहीं कर रहे हैं। शहीद की पत्नी संगीता की 10 वर्ष पूर्व शिकोहाबाद में सड़क दुर्घटना में मौत हो चुकी है। बेटी शिल्पी नोएडा डाक्टरी की पढ़ाई कर रही है और बेटा शुभम फिरोजाबाद के जान एकेडमी स्कूल में पढ़ता है। माता रामश्री का कहना है शहादत के बाद मिली गैस एजेंसी का शिकोहाबाद में संचालन हो रहा है। जिसकी देखभाल शहीद के भाई जगमोहन सिंह करते हैं।
घिरोर के शाहजहांपुर निवासी सत्यदेव सिंह यादव 24 घुसपैठियों को मारने के बाद शहीद हुए थे। पत्नी विमला देवी पति की मृत्यु का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई और दो साल बाद ही मौत हो गई। पुत्र बॉबी यादव का बाबा पालसिंह यादव, दादी जावित्री देवी, चाचा शिवमंगल ने ही पालन पोषण किया है। शहादत के बाद मिली गैस एजेंसी का घिरोर में संचालन शहीद के पिता करते हैं। उनका कहना है प्रशासन ने शहीद परिवारों की ओर से आंखें फेर ली हैं। अब कोई नेता तथा अधिकारी शहीद परिवारों का हाल जानने नहीं आता है। तहसील और थाने तक की शिकायतों के निस्तारण में परेशानी का सामना करना पड़ता है। शहीद के पुत्र बाबी को मोदी योगी सरकार से बहुत उम्मीदें हैं।
किशनी के दिवनपुर साहिनी निवासी अमरुद्दीन की कम उम्र में शहादत के बाद पत्नी मोमना बेगम ने जिम्मेदारी संभाली। इस्लाम धर्म में मूर्ति स्थापना का रिवाज नहीं होने के कारण 17 वर्षों तक शहीद प्रतिमा ताबूत में रखी रही। तीन जुलाई 2017 को शहीद के बेटे आरिफ खान ने पिता की प्रतिमा को गैस एजेंसी के गेट पर लगवाया है। आरिफ बताते हैं शहादत के समय आए कांग्रेस नेता मनिंदर जीत सिंह बिट्टा काफी बातें कर गए लेकिन अब लौटकर गांव नहीं आए।
अमरुद्दीन की पत्नी मोमना बेगम पाकिस्तान की घुसपैठ से बेहद खफा हैं। उनका कहना है पाकिस्तान हमेशा भारत के खिलाफ छद्म युद्ध लड़ता है। देश के जांबाज सैनिक अपनी शहादत देते हैं।
शहीद स्मारक पर शराबियों का कब्जा
बेवर। बेवर के गढ़िया घुटारा में बने शहीद मुनीष कुमार यादव के स्मारक पर अब परिवारीजन जाने से डरते हैं। वहां पर जुआरियों और शराबियों का कब्जा है। अंधेरा होते ही शराबी वहां जमा होते हैं। विरोध करने पर परिवारीजनों को सबक सिखाने की धमकी देते हैं। गांव में बनाई जाने वाली अवैध शराब की जखीरा तक वहां एकत्रित किया जाता है। पुलिस परिवारीजनों की सुनवाई नहीं करती है।
कारगिल शहीदों का इतिहास
- अंजनी निवासी प्रवीन कुमार यादव ने कारगिल चोटी पर तीन जून 1999 को शहादत दी
-गढ़िया घुटारा के ग्रेनेडियर मुनीष कुमार यादव कारगिल चोटी तीन जून को 1999 को शहीद हुए
- नगला आंध्रा निवासी हेमचरन सिंह यादव ने 23 जुलाई 1999 को कारगिल क्षेत्र में शहादत दी
- दिवन्नपुर साहिनी के ग्रेनेडियर अमरुद्दीन ने तीन जुलाई 1999 को देश की सीमा की रक्षा करते हुए शहादत दी
- शाहजहांपुर निवासी सत्यदेव यादव ने 23 जुलाई 1999 को 18 पाक घुसपैठियों को मारकर शहादत पाई