वृंदावन (मथुरा)। परंपरागत रूप से ब्रज के मंदिरों में प्रभु की ग्रीष्मकालीन सेवा के भाव को आत्मसात करती फूलबंगला परंपरा लंबे सफर को तय कर एक समृद्ध कला के रूप में स्थापित हो गई है। मंदिरों में विकसित हुई इस कला की गहराइयों का बोध सायंकालीन बेला में होने वाले समाज गायन से होता है।
पारंपरिक रूप से कला से जुड़े पंडित गिरधारी लाल शर्मा के अनुसार भक्तिकाल में फूलबंगला की कलात्मक परंपरा का उद्भव ब्रज में ठाकुरजी को गर्मी के प्रकोप से शांति प्रदान करने के लिए शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि मोगरा अथवा रायवेल के फूलों की लड़ियां बनाकर उन्हें वृंदावनी, छहमास, अठमास, डबल चौकी अठमास आदि शैलियों में फ्रेम अथवा ठाठ पर लगाया या बांधा जाता है। वहीं केले के पेड़ के तने को छीलकर ठाठ पर कलात्मक आकृतियां बनाई जाती हैं। अब चुनिंदा कला साधक ही ब्रज की इस कला को जीवंत रखने के लिए साधनारत हैं।
संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार की योजना के अंतर्गत ब्रज की मंदिर संस्कृति से जुड़ी शब्दावलियों पर शोध कार्य कर रहीं संस्कृति अध्येता प्रगति शर्मा बताती हैं कि फूलबंगला का आकर्षण सैकड़ों वर्षों में इस कला को लक्षित कर रचे गए साहित्य ने इसे विशेष स्थान प्रदान किया है। उन्होंने बताया कि इस कला से जुड़े लोगों के बीच पीढ़ियों से संरक्षित ठाठ, बगली, हथिनी, मार्का, तिदरा, बिछैया और जोगपीठ जैसे शब्द इस कला से संबंधित हैं।