लखनऊ। जैव प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल विलुप्त होती प्रजातियों को बचाने में बेहतर तरीके से किया जा सकता है। आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रजातियों की कमी दूर करने के साथ इनकी आनुवंशिक विविधता को बढ़ाने में भी इससे काफी सफलता मिल सकती है। ये बातें राष्ट्रीय जीनोम अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के संस्थापक निदेशक प्रो. आशीष दत्ता ने कहीं। वे शुक्रवार को एनबीआरआई सभागार में हीरक जयंती व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे।
जेनएयू, दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. दत्ता ने कहा कि ‘विज्ञान को समाज तक पहुंचाने का स्वप्न’ विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. दत्ता ने कहा कि जीनोम अनुसंधान पर वर्तमान प्रवृत्ति पहले से ही उन देशों के अर्थशास्त्र के लिए एक विशेष चुनौती और गंभीर खतरा है जो उपलब्ध प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने में समर्थ साबित नहीं हो रहे। समाज सेवा में वैज्ञानिक कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि केडिंडा एलबिकान्स की रोगाणुकता आनुवंशिक रूप से रूपांतरित फसलों द्वारा खाद्य सुरक्षा में सहायक बना है। पोषकीय जीनोमिक्स से नया जीन खोजा गया है जो फलों के पकने की प्रक्रिया को आसान और सुरक्षित बनाता है। उन्होंने बताया कि चौलाई की जीन को आलू में डालकर ट्रांसजेनिक आलू बनाया गया है। इसमें सामान्य आलू से ज्यादा प्रोटीन होती है।