लखनऊ। तारीख के पन्नों में अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह की शख्सियत के उम्दा पहलुओं को दर्ज ही नहीं किया गया, क्योंकि अंग्रेजों द्वारा उनके नाम के साथ चस्पा की गईं बदनामियां ही सुर्खियों में रहीं। गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल कायम करने वाले वाजिद अली शाह के धर्मनिरपेक्ष, साहित्यकार, संस्कृति व कला के पोषक स्वरूप को कभी ठीक से सामने नहीं रखा गया। ये विचार रविवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल में वाजिद अली शाह पर हुई परिचर्चा में उभरकर सामने आए।
परिचर्चा में विषय को स्थापित करते हुए वीना तलवार ने कहा कि उन्हें लंदन में पहली बार म्यूजियम में वाजिद अली शाह के बारे में जो जानकारी मिली, वह उनके शराबनोशी समेत तमाम नकारात्मक पहलुओं से भरी थी। बाद में अध्ययन के दौरान कई गलतफहमियां दूर हुईं। राजा महमूदाबाद अमीर मोहम्मद अमीर सुलेमान खान ने बताया कि अवध के नवाब के तौर पर वाजिद अली शाह की धर्मनिरपेक्षता आज भी एक मिसाल है। 1855 में अयोध्या की हनुमानगढ़ी के विवाद का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उस वक्त किस तरह से वाजिद अली शाह ने न केवल फरंगीमहली समेत चार मौलानाओं को इस विवाद को सुलझाने के लिए अमीरुद्दीन से बात करने भेजा, बल्कि जरूरत पड़ने पर फौज का भी इस्तेमाल किया, लेकिन निजाम की नीयत पर कोई सवाल नहीं उठने दिया। उन्होंने कहा कि पूरे राज्य में उनके द्वारा जगह-जगह बक्से रखवाए गए थे जिसमें कोई भी नागरिक भ्रष्टाचार समेत अन्य शिकायतों की पर्चियां डाल सकते थेे। अमरीश मिश्रा ने कहा कि अंग्रेज वाजिद अली शाह से इसलिए नहीं घबराते थे कि वे मुस्लिम शासक थे, बल्कि वाजिद अली शाह जिस तरह से अवाम को साथ लेकर चलते थे, फिरंगी हुकूमत इससे खौफजदा रहती थी।
कोलकाता से आए वाजिद अली शाह के वंशज आसफ अली मिर्जा ने वाजिद अली शाह के बौद्धिक पक्ष पर रोशनी डालते हुए कहा कि उन्होंने 117 किताबें लिखीं जिनमें कथक पर लिखी किताब ‘बनी’ कोलकाता में पूरी की थी। उन्होंने कहा कि वाजिद अली पर वुमनाइजर का आरोप सही नहीं है। उन्होंने महल में तमाम औरतों को अलग-अलग काम दे रखा था और इसके लिए उन्हें बाकायदा पगार दी जाती थी। परिचर्चा में अंग्रेजी की सितमजरीफी का उल्लेख करते हुए रोशन तकी ने कहा कि अवाम में ऐसी मशहूरियत विरले ही बादशाहों को मिलती है जैसी वाजिद अली को मिली। परिचर्चा के दौरान फिल्मकार मुजफ्फर अली भी सभागार में श्रोताओं के बीच आकर बैठ गए। जब रोशन तकी की नजर उन पर पड़ी तो उन्होंने मुजफ्फर अली को मंच पर बुला लिया।
कब आओगे कलकत्ता वाले जोया
वाजिद अली के प्रति उनके चाहने वालों की दीवानगी का जिक्र करते हुए रोशन तकी ने जोश मलीहाबादी द्वारा लिखा एक उद्धरण रखा। वाजिद अली शाह को लखनऊ से निर्वासित किए जाने के कई साल बाद भी 80 साल की एक बूढ़ी महिला हर सावन के मौसम में महल के दालान में जाती और फुहारों के बीच गाती- ‘सावन की झड़ी लगी, कब आओगे कलकत्ता वाले जोया’।
एक दिन के जोगी बनते थे शाह
परिचर्चा के दौरान वाजिद अली द्वारा रामायण पर ड्रामा तैयार करवाने की बात पर आसिफ अली मिर्जा व रोशन तकी में नाइत्तफाकी भी दिखी। रोशन तकी ने बताया कि नजूमियों ने वाजिद अली के जोगी बनने की घोषणा की थी। इससे बचने का इलाज यह निकाला गया कि बादशाह साल में एक दिन के लिए जोगी बनें। हर जन्मदिन पर वे जोगी बाना पहनते थे और उस दिन कैसरबाग महल के दरवाजे आम जनता के लिए खोल दिए जाते थे। उन्होंने बताया कि वाजिद अली ने किस्सा राधा कन्हैया उस वक्त खिलवाया था जब वे बादशाह नहीं वरन युवराज थे।
तहजीब भी खटकी क्वीन को
रोशन तकी ने कहा कि अवध की नवाबी से वाजिद अली को बेदखल न करने की गुजारिश लेकर जो प्रतिनिधिमंडल महारानी विक्टोरिया से मिलने गया उसे रानी ने सकारात्मक आश्वासन दिया। अपनी तहजीब के मुताबिक सभी लोग रानी के उठने से पहले ही खड़े हो गए। यह बात क्वीन को चुभ गई और अवध की नवाबी को बचाने में उन्होंने दखल नहीं दिया।
वाजिद अली के नाम पर हो चेयर
राजा महमूदाबाद अमीर मोहम्मद अमीर सुलेमान खान ने परिचर्चा के बाद सूबे की सरकार से अपील की कि अवध के इतिहास के अध्ययन के लिए वाजिद अली शाह के नाम पर एक चेयर इंस्टीट्यूट की स्थापना की जाए।
तीन दिन पुरानी खुशबू
परिचर्चा के दौरान फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह बतौर श्रोता हॉल में मौजूद थे। आखिर में उन्होंने आसिफ अली मिर्जा से सत्यजित राय की फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर उनकी राय पूछी। आसिफ ने टॉम आल्टर व रिचर्ड एटनबरो का किस्सा बयां करते हुए बताया कि एटनबरो ने टॉम से कहा कि जनाब इत्र बहुत महक रहा है, टॉम ने जवाब दिया, तीन दिन पहले उनके गले लगा था, उसी की खुशबू है।