लखनऊ। एसजीपीजीआई के मेटरनल एंड चाइल्ड हेल्थ विभाग में एक महिला के सात माह के गर्भस्थ शिशु को रक्त चढ़ाकर उसकी जान बचा ली गई। सेना के कमांड हॉस्पिटल से इस महिला को रिफर किया गया था। महिला के शरीर में बच्चे के रक्त के प्रति एंटीबॉडी बन जाने के कारण उसकी जान को खतरा पैदा हो गया था। गर्भ में पल रहे बच्चे के शरीर में इसके कारण खून की कमी हो गई थी और उसके विभिन्न अंगों में पानी भर गया था। शनिवार को मेटरनल एंड चाइल्ड हेल्थ विभाग की प्रो. मंदाकिनी प्रधान ने गर्भस्थ शिशु को रक्त चढ़ाकर उसकी जान बचाई। बच्चे का जन्म होने तक उसके खून की जांच की जाएगी और जरूरत पड़ने पर रक्त चढ़ाया जाएगा। प्रो. मंदाकिनी प्रधान ने बताया कि कमांड हॉस्पिटल में सैन्यकर्मी की गर्भवती पत्नी की जांच के दौरान पता चला कि उसके बच्चे की शरीर में खून की कमी है और अंगों में पानी भर रहा है। इसकी जानकारी होने के बाद गर्भवती महिला को पीजीआई भेज दिया गया। मेटरनल एंड चाइल्ड हेल्थ विभाग में आने के बाद बच्चे की खून की जांच करायी गई तो उसका हीमोग्लोबिन तीन मिलीग्राम निकला। इसके बाद शिशु की जान बचाने के लिए गर्भ में ही उसे रक्त चढ़ाने (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की प्रक्रिया शुरू की गई। बच्चे के लिए ओ निगेटिव ग्रुप (यूनिवर्सल ब्लड ग्रुप) का इंतजाम किया गया और उसे तुरंत चढ़ाया गया। प्रो. मंदाकिनी ने बताया कि ब्लड ट्रांसफ्यूजन के बाद उसका हीमोग्लोबिन बढ़कर 10 मिलीग्राम हो गया है। अभी 36 सप्ताह पूरे होने तक बच्चे के स्वास्थ्य पर नजर रखी जाएगी। इस दौरान यदि फिर से उसे खून की कमी होती है तो ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया जाएगा। प्रो. मंदाकिनी ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया को इंट्रा यूटराइन ब्लड ट्रांसफ्यूजन कहा जाता है।
250 ग्राम के गर्भस्थ को किया जा चुका है ट्रांसफ्यूजन ः प्रो. मंदाकिनी प्रधान ने बताया कि उनके विभाग में बीते तीन साल में 120 गर्भस्थ शिशुओं को गर्भ में ही ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया जा चुका है। विश्व में सबसे कम उम्र के बच्चे को इंट्रा यूटराइन ब्लड ट्रांसफ्यूजन का रिकार्ड भी पीजीआई के नाम है। 19 सप्ताह के गर्भस्थ शिशु का वजन मात्र 250 ग्राम था और हीमोग्लोबिन मात्र 1.8 मिलीग्राम। सही समय पर शिशु में हो रही दिक्कत की जानकारी मिलने के कारण उसकी जान बचा ली गई। इस समय बच्चे का जन्म हो चुका है और वो चार माह का है।
मां के ब्लड ग्रुप की जांच है जरूरी ः प्रो. मंदाकिनी ने बताया कि यदि मां का ब्लड ग्रुप निगेटिव और पिता का पॉजिटिव है तो उनके होने वाले बच्चे का ब्लड ग्रुप पॉजिटिव होेने की संभावना होती है। ऐसे में मां में बच्चे के खून के प्रति एंटीबॉडी डेवलप हो जाती है। यदि मां का ब्लड ग्रुप निगेटिव होने का पता चल जाए तो उसे एंटी डी इंजेक्शन लगा दिया जाता है। इससे एंटीबॉडी बनने की प्रक्रिया रुक जाती है। यदि ये इंजेक्शन न लगे महिला के रक्त में पॉजिटिव ब्लड के प्रति एंटीबॉडी बन जाती है। जब महिला दोबारा गर्भवती होती है तो उसके बच्चे केशरीर में खून की कमी होने लगती है। साथ ही दिल, फेफड़ों में पानी भरने लगता है। इससे बच्चे की हृदय गति रुक जाती है और उसकी मौत हो जाती है। उन्होंने बताया कि बच्चे के शरीर में खून की कमी के बारे में डॉपलर अल्ट्रासाउंड से पता लगाया जाता है। इसमें देखा जाता कि बच्चे के मस्तिष्क में रक्त की आपूर्ति की क्या स्थिति है? यदि रक्त का बहाव कम है तो उसे ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत पड़ती है।