लखनऊ। कोटे के काम पर रोक को लेकर पार्षदों का विरोध देखते हुए नगर आयुक्त बैकफुट पर आ गए हैं। दो अरब की देनदारी के बावजूद उन्होंने कोटे के कार्य कराने पर सहमति जता दी है। कोटे की फाइलों पर बजट सील न लगाए जाने से उपजे विवाद के बाद सोमवार को नगर निगम मुख्यालय स्थित महापौर कक्ष में पंचायत हुई। करीब एक घंटे तक बंद कमरे में हुई पंचायत में कांग्रेस, सपा और भाजपा के पार्षद दल के नेता प्रमुख रूप से मौजूद रहे। इस दौरान नगर आयुक्त और पार्षदों ने एक दूसरे पर आरोप लगाते रहे।
पार्षदों ने आरोप लगाया कि लेखाधिकारी ने यह कहते हुए बजट सील नहीं लगाई थी कि नगर आयुक्त ने रोक लगाई है। जबकि नगर आयुक्त राकेश कुमार सिंह ने इस आरोप को सिरे से नकारा। कांग्रेस पार्षद दल की नेता ममता चौधरी ने नगर आयुक्त को करीब दस दिन पहले की मुलाकात भी याद दिलाई। जिसमें उन्होंने कहा था कि कोटा पास होने से क्या होता है, जब पैसा होगा तब काम कराया जाएगा। इस पर सभी दलों के पार्षद नगर आयुक्त पर नगर निगम सदन और कार्यकारिणी की अवमानना का आरोप लगाने लगे। मामला बढ़ता देख महापौर ने पार्षदों को शांत कराया। इसके बाद नगर आयुक्त ने भी कोटे के कार्य कराने पर सहमति दे दी। इसके लिए मुख्य अभियंता और लेखाधिकारी को बुलाकर आवश्यक निर्देश भी दिए।
कार्यशैली पर नाखुशी
कोटे की बाहली से पहले पार्षदों ने महापौर के सामने जबरदस्त नाराजगी जाहिर की। पार्षदों का कहना था कि ऐसा पहली बार हुआ है जब चुनकर आने के करीब छह महीने बाद भी विकास कार्य शुरू नहीं कराए गए। तनाव इतना अधिक था कि पार्षदों ने सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाकर नगर आयुक्त को वापस भेजने तक की बात कही।
विकास नहीं तो टैक्स नहीं
कोटे की बहाली होने से पहले गुस्साए कई पार्षदों ने ने विकास कार्य न होने पर नगर आयुक्त कक्ष में ताला डालने और हाउस टैक्स वसूली बंद कराने तक की चेतावनी दे डाली। इसके साथ धरने पर बैठने की धमकी भी दी।
लेट हुए नगर आयुक्त
कोटे के विवाद को हल करने के लिए महापौर ने शाम चार बजे नगर आयुक्त व सभी पार्टियों के पार्षद दल नेताओं को बुलाया था। महापौर और पार्षद तो समय से पहुंच गए मगर नगर आयुक्त किसी बैठक में होने की वजह से लेट हो गए। इसे लेकर पार्षद भड़क गए और बैठक रद करने की मांग करने लगे। नगर आयुक्त करीब साढ़े चार बजे पहुंचे।