लखनऊ। ये कहते थे शहेवाला सकीना हम नहीं होंगे...इस नौहे को सुन स्याह लिबास में अजादारों को करबला की कयामत का वह मंजर याद आ गया, जब हजरत इमाम हुसैन और उनके साथी मानवता के लिए कुर्बान हो गए। मुश्ताक लखनवी के इस नौहे को सुन अजादार अपने आंसू रोक न सके।
चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था के बीच शुक्रवार को निकले शाही जरीह के जुलूस में नवाबी परंपरा के अनुसार शाही बाजा, रौशन चौकी से गूंजती मातमी शहनाई, शाही निशान लिए हाथी, ऊंट का कारवां आगे-आगे चल रहा था। इसके पीछे मातमी बैंड हुसैन का गम मना रहे थे। सोजख्वान ...ऐ मोमिनों हुसैन से मकतल करीब है,...मुजरई खल्क ने इन आंखों से क्या क्या देखा, मर्सिया पढ़ रहे थे। इसे सुन कर अजादार रो रहे थे। इसी के साथ हजरत इमाम हुसैन की सवारी दुलदुल, हजरत अब्बास का अलम और छह माह के मासूम अली असगर का झूला भी शोकाकुल अजादारों को रोने के लिए बेकरार कर रहा था। ताबूत, अलम और झंडों के बीच जब मोम की शाही जरीह निकली तो जुलूस के साथ चल रहे अजादार उसकी जियारत को बेकरार हो गए। जुलूस में सबसे पीछे चल रहे अंजुमन शब्बीरिया के मातमदार नौहा पढ़ रहे थे...ये कहते थे शहेवाला सकीना हम नहीं होंगे। नौहों की यह पंक्तियां अजादारों को उस मंजर की याद दिल रही थी जब करबला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन दीन-ए-हक के लिए अपनी मासूम बेटी हजरत सकीना से रुखसत हो रहे हैं...। जुलूस में शाही घराने के साथ जिला प्रशासन के अधिकारी मौजूद रहे।
शाम पांच बजे निकाले गए इस मोम की शाही जरीह के जुलूस से पहले आसिफी इमामबाडे़ में एक मजलिसहुई। मजलिस को मौलाना अली हैदर ने संबोधित किया। उन्होंनेे रसूल और उनके नवासे हजरत इमाम हुसैन के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कर्बला की शहादतों का जिक्र किया। मजलिस के बाद निकाला गया मोम की शाही जरीह जुलूस देर रात छोटे इमामबाड़े में रात नौ बजे संपन्न हुआ। इस मौके पर जिलाधिकारी अनुराग यादव के अलावा अन्य प्रशासन व पुलिस अधिकारी के साथ रायल फैमली आफ अवध व बेगमात रायल फैमली आफ अवध की महिलाएं भी शामिल रहीं।