19 माह बाद भी वादी को वांछित सूचना मुहैया न कराने पर मुख्य सूचना आयुक्त रणजीत सिंह पंकज ने 13 जून को परिवार कल्याण महानिदेशक पर 25 हजार रुपये का जुर्माना ठोका है। इसकी वसूली परिवार कल्याण महानिदेशक डॉ.वेद प्रकाश गुप्ता के वेतन से अधिकतम तीन माह में की जाएगी।
2011 में ही मांगी गई थी सूचना
जन कल्याण महामंच के प्रदेश अध्यक्ष पीतांबर भट्ट ने सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत 8 दिसंबर 2011 को परिवार कल्याण महानिदेशक के यहां आरटीआई दाखिल की थी।
इसके जरिए पांच और सात अप्रैल 2011 को संयुक्त निदेशक डॉ.राजेंद्र सिंह के स्तर से एनआरएचएम योजना में हुए घोटाले के संबंध में वजीरगंज थाने में दर्ज कराई गई।
अलग-अलग एफआईआर से पहले विभागीय स्तर पर कराई गई प्राथमिक जांच रिपोर्ट मांगी गई थी। साथ ही एनआरएचएम घोटाले में आरोपी बनाए गए डॉक्टरों और विभागीय कर्मचारियों के खिलाफ पहले किसी तरह की गड़बड़ी की दर्ज हुई शिकायत या उसके आधार पर किसी भी स्तर पर हुई विभागीय जांच-पड़ताल से जुड़ी जानकारी भी मांगी गई थी।
2012 में फिर की अपील
वांछित समय में विभाग द्वारा ये सूचना उपलब्ध न कराने पर आठ फरवरी 2012 को प्रथम अपीलीय अधिकारी के समक्ष पहली अपील प्रस्तुत की गई। इसके बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर वादी ने आयोग में 30 अप्रैल 2012 को दूसरी अपील दाखिल की।
नोटिस को किया नजरअंदाज
परिवार कल्याण डीजी को 19 नवंबर 2012 को अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस भेजा गया। इसकी अनदेखी के बाद आयोग ने प्रतिवादी को 9 मई 2013 को सुनवाई के लिए उपस्थित होने को कहा लेकिन कोई नहीं आया।
तीन किस्तों में देना होगा जुर्माना
इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्य सूचना आयुक्त ने शिकायत संख्या एस-10/1729/सी/ 2012 का अंतिम निस्तारण करते हुए 13 जून को फैसला सुनाया। इसके तहत परिवार कल्याण डीजी पर 25 हजार का जुर्माना ठोकते हुए इसकी वसूली अधिकतम 31 अक्तूबर 2013 तक तीन किस्तों में उनके वेतन से करने के निर्देश दिए गए।
औपचारिकता बिना एफआईआर तो कैसे मिले जवाब
एनआरएचएम के संचालन में वित्तीय गड़बड़ी कर सरकारी पैसे का गबन करने से जुड़ी दो अलग-अलग एफआईआर परिवार कल्याण में तैनात तात्कालिक संयुक्त निदेशक डॉ.राजेंद्र सिंह ने पांच और सात अप्रैल 2011 को वजीरगंज थाने में कराई थी।
जांच की हुई अनदेखी
इसमें राजपत्रित अधिकारियों सहित कई लिपिकीय संवर्ग कर्मचारियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। जानकार बताते हैं कि सेवा नियमावली के तहत इस तरह की प्राथमिकी पुलिस में दर्ज कराने से पहले पूरे मामले की विभागीय स्तर पर प्राथमिक जांच करानी होती है।
इस मामले में एफआईआर लिखवाने की हड़बड़ी में विभागीय जांच की औपचारिकता निभाने की पूरी तरह अनदेखी रही। आला अधिकारियों के सिर्फ मौखिक दिशा-निर्देश पर कारवाई की गई एफआईआर ही अब पूरे प्रशासन के लिए सिरदर्द बन रही है।