हेल्प एज इंडिया का सर्वे बताता है की बुजुर्गों के प्रताड़ना के 56% केस में बेटा जिम्मेदार होता है और 26% केस में जिम्मेदार बहु होती है। विडंबना यह है की बुजुर्गों में भी मां ज्यादा शोषित होती है। हमें यह समझना होगा की बुढ़ापे के बाद कभी व्यक्ति की जवानी नहीं लौटती लेकिन हर जवान व्यक्ति का बुढ़ापा आना निश्चित है।
हम जैसे बीज आज बोयेंगे वैसे ही फल कल प्राप्त करेंगे। संभवतः इसीलिए प्राचीन काल में वृद्धाश्रम का प्रावधान नहीं था। व्यक्ति का बुजुर्ग होना अर्थात अनुभव का मजबूत स्तंभ बनना होता है। विडंबना है कि हमनें केवल पश्चिम के पहनावे, खानपान को ही अपने जीवन में धारण नहीं किया बल्कि वृद्धाश्रम की संस्कृति को भी शामिल कर लिया है भारत में पिछले कुछ समय से वृद्धाश्रमों में तेजी से वृद्धि देखी गई है एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्तमान में लगभग 728 ऐसे ओल्ड ऐज होम जहाँ बुजुर्गों की बेहतर तरीके से देखभाल की जाती है लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है क्या उन बुजुर्गों को ओल्ड ऐज होम की आवश्यकता है या अपने बच्चों के प्रेम, सम्मान और साथ की।
भारत सरकार ने बुजुर्गों को लेकर कई कानून बनाए हैं, जिनका पालन कर बुजुर्ग अपने ऊपर हो रहे अन्याय का विरोध दर्ज करा सकते हैं। एम डब्ल्यू पी एस सी (MWPSC) यह कानून खासतौर से बुजुर्गों की समस्याओं पर केंद्रित है। वे माता-पिता जो अपनी आय या संपत्ति के जरिए अपनी देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं और उनकी सेवा में उनके बच्चे या रिश्तेदार उनका ध्यान नहीं रख रहे हैं, तो अपने लिए भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं। उन्हें प्रतिमाह ₹10000 तक का गुजारा भत्ता मिल सकता है। खास बात यह है कि भरण-पोषण के आदेश का एक माह के भीतर पालन करना अनिवार्य है।
संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन, वृद्धजनों की बुनियादी जरूरतों का न मिल पाना, मानवाधिकार की दृष्टि में भी हनन को दर्शाता है। भारत का संविधान अनुच्छेद 21, जो कि प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा पूर्ण तथा स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार देता है, उसका भी हनन है।
हेल्प एज इंडिया के आंकड़ों की माने तो लगभग 47% वृद्धजन अपने परिवारों पर आर्थिक रूप से निर्भर है और 34% पेंशन और सरकारी नकद हस्तांतरण पर निर्भर है।
एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बुजुर्गों की आबादी अगले दशक में 41% तक बढ़ने का अनुमान है। लगभग 2031 तक भारत में 194 मिलियन वरिष्ठ नागरिक हो जायेंगे ऐसी स्थिति में उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होगी। उनका परिवार में स्थान मुखिया का है इस बात की समझ और नैतिकता का ध्यान समाज एवं परिवार को ही रखना होगा।
हमें विशेष तौर पर यह देखना होगा की हमारे विकास की कीमत हमारे बुजुर्ग न चुकाएं। घर के बुजुर्ग घर की रौनक है उनके बिना ना संसार में सुख है न स्वर्ग में। शायद इसीलिए मां के पांव में जन्नत और पिता जन्नत का दरवाजा कहा गया है।
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