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टूटते परिवार: विकास की कीमत चुकाते हमारे बुजुर्ग

सार

भारतीय संस्कृति में परिवार के बुजुर्ग का स्थान एक मजबूत स्तंभ की तरह रहा है, जो पूरे परिवार को संबल देने वाला होता है। तेजी से बदलते समाज ने न केवल हमारे खान पान, पहनावे पर प्रभाव डाला अपितु हमारे पारिवारिक ढांचे पर भी सेंध लगा डाली है।
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Senior Citizen - फोटो : Istock
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विस्तार
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भारतीय संस्कृति में परिवार के बुजुर्ग का स्थान एक मजबूत स्तंभ की तरह रहा है, जो पूरे परिवार को संबल देने वाला होता है। तेजी से बदलते समाज ने न केवल हमारे खान पान, पहनावे पर प्रभाव डाला अपितु हमारे पारिवारिक ढांचे पर भी सेंध लगा डाली है। परिवार के ये मजबूत स्तंभ विकास और आधुनिकता के इस दौर में घर के पुराने सामान की तरह लगने लगे हैं, जिनका इस्तेमाल होना बंद होता जा रहा है। घर के बुजुर्ग कोई वस्तु नहीं जिनकी जरूरत खत्म होने पर उन्हें किसी वृद्धाश्रम में छोड़ा जाए बल्कि वो उस घर के मालिक हैं परिवार उनकी संपत्ति और वो हमारी संस्कृति के धरोहर हैं। 

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आधुनिक बदलाव को परिवार, त्योहार, परंपराएं, रीति- रिवाजों पर देखा जा सकता है। हम आधुनिकता के बाजार में खड़े हैं और अपने संस्कारों के बैंक बैलेंस को धीरे धीरे खत्म करते जा रहे हैं। बुजुर्गों से प्रतिदिन लेने वाले आशीर्वाद को विभिन्न इंटरनेशनल डेज में ली गई सेल्फी में बदलते जा रहे हैं। अपने बुजुर्गों से व्यक्त करने वाले प्रेम को व्हाट्सएप स्टेटस में व्यक्त करने लगे हैं जबकि ज्यादातर बुजुर्गों के पास मोबाइल फोन या तो रहता ही नहीं या फिर होता भी है तो उन्हें चलाना नहीं आता।

ऐसे बहुत कम बुजुर्ग हैं जो उन संदेशों को समझ पाते हैं। हम एक ओर बहुत सामाजिक होने का दावा पेश करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर अपनी परंपरागत सामाजिकता को खोखला बनाते जा रहे हैं। देश में तेजी से बढ़ते वृद्धाश्रम इस बात की प्रमाण देते हैं की बुजुर्गों के लिए घरों में जगहें सिमटती जा रही हैं। उन्हें लग्जरी सुविधाएं नहीं अपने घर में प्यार और सम्मान का भाव चाहिए। जो कहीं न कहीं उन्हें प्राप्त नहीं हो रहा और बुढापे में वे केवल शरीर से नहीं अपितु मन से जर्जर होते जा रहे हैं। आधुनिकता का यह दौर कहीं से भी भारतीय संस्कृति की पहचान नहीं है। 
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आंकड़े बताते हैं की वृद्धाश्रम में रहने वाले कई बुजुर्ग संभ्रांत परिवारों से भी हैं। जिनके बच्चों के पास उनके साथ बिताने के लिए समय नहीं है और न ही उनके बनाये गए घर में रहने के लिए जगह। रिश्तें जीवन की वो जमा पूंजी होते हैं जिन्हें व्यक्ति अपने बुढापे के लिए जोड़ता है और जब वही रिश्तें अंजान बन जाएं तो व्यक्ति मन से खाली हो जाता है। एक सर्वे के मुताबिक 30 से 50 फीसदी बुजुर्ग अकेले रहने के कारण अवसाद का शिकार हो जाते हैं। अकेलापन उनके डिप्रेशन का प्रमुख कारण है। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा वर्ष 2018 में एक रिपोर्ट जारी की गई, जिसमें यह कहा गया कि वर्ष 2016 की तुलना में वर्ष 2018 तक वरिष्ठ नागरिकों के प्रति अपराध के मामलों में 13.7% की वृद्धि हुई है। अर्थात बुजुर्गों पर हिंसा का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। यह चिन्ता के साथ चिंतन का विषय होना चाहिए।

सोशल मीडिया के दौर ने बुजुर्गों के साथ हो रहे अत्याचार को समाज के सामने और स्पष्ट कर दिया है, प्रायः देखा गया है कि कहीं प्रॉपर्टी के विवाद में मां को मार दिया गया, तो कहीं सालों पिता को घर में कैद कर यातना दिए जाने का पता चला, कहीं बेटे के चाटा मारने से हुई मां की मौत का वीडियो वायरल हुआ। जो एक ऐसे बर्बर समाज की तसदीक करता है, जो भारतीय संस्कृति का हिस्सा तो बिल्कुल नहीं हो सकता। 

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Senior Citizen - फोटो : Istock
हेल्प एज इंडिया का सर्वे बताता है की बुजुर्गों के प्रताड़ना के 56% केस में बेटा जिम्मेदार होता है और 26% केस में जिम्मेदार बहु होती है। विडंबना यह है की बुजुर्गों में भी मां ज्यादा शोषित होती है। हमें यह समझना होगा की बुढ़ापे के बाद कभी व्यक्ति की जवानी नहीं लौटती लेकिन हर जवान व्यक्ति का बुढ़ापा आना निश्चित है।

हम जैसे बीज आज बोयेंगे वैसे ही फल कल प्राप्त करेंगे। संभवतः इसीलिए प्राचीन काल में वृद्धाश्रम का प्रावधान नहीं था। व्यक्ति का बुजुर्ग होना अर्थात अनुभव का मजबूत स्तंभ बनना होता है। विडंबना है कि हमनें केवल पश्चिम के पहनावे, खानपान को ही अपने जीवन में धारण नहीं किया बल्कि वृद्धाश्रम की संस्कृति को भी शामिल कर लिया है भारत में पिछले कुछ समय से वृद्धाश्रमों में तेजी से वृद्धि देखी गई है एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में वर्तमान में लगभग 728 ऐसे ओल्ड ऐज होम जहाँ बुजुर्गों की बेहतर तरीके से देखभाल की जाती है लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है क्या उन बुजुर्गों को ओल्ड ऐज होम की आवश्यकता है या अपने बच्चों के प्रेम, सम्मान और साथ की।

भारत सरकार ने बुजुर्गों को लेकर कई कानून बनाए हैं, जिनका पालन कर बुजुर्ग अपने ऊपर हो रहे अन्याय का विरोध दर्ज करा सकते हैं। एम डब्ल्यू पी एस सी (MWPSC) यह कानून खासतौर से बुजुर्गों की समस्याओं पर केंद्रित है। वे माता-पिता जो अपनी आय या संपत्ति के जरिए अपनी देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं और उनकी सेवा में उनके बच्चे या रिश्तेदार उनका ध्यान नहीं रख रहे हैं, तो अपने लिए भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं। उन्हें प्रतिमाह ₹10000 तक का गुजारा भत्ता मिल सकता है। खास बात यह है कि भरण-पोषण के आदेश का एक माह के भीतर पालन करना अनिवार्य है। 
 
संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन, वृद्धजनों की बुनियादी जरूरतों का न मिल पाना, मानवाधिकार की दृष्टि में भी हनन को दर्शाता है। भारत का संविधान अनुच्छेद 21, जो कि प्रत्येक व्यक्ति को गरिमा पूर्ण तथा स्वतंत्र जीवन जीने का अधिकार देता है, उसका भी हनन है।

हेल्प एज इंडिया के आंकड़ों की माने तो लगभग 47% वृद्धजन अपने परिवारों पर आर्थिक रूप से निर्भर है और 34% पेंशन और सरकारी नकद हस्तांतरण पर निर्भर है।

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बुजुर्गों की आबादी अगले दशक में 41% तक बढ़ने का अनुमान है। लगभग 2031 तक भारत में 194 मिलियन वरिष्ठ नागरिक हो जायेंगे ऐसी स्थिति में उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होगी। उनका परिवार में स्थान मुखिया का है इस बात की समझ और नैतिकता का ध्यान समाज एवं परिवार को ही रखना होगा।

हमें विशेष तौर पर यह देखना होगा की हमारे विकास की कीमत हमारे बुजुर्ग न चुकाएं। घर के बुजुर्ग घर की रौनक है उनके बिना ना संसार में सुख है न स्वर्ग में। शायद इसीलिए मां के पांव में जन्नत और पिता जन्नत का दरवाजा कहा गया है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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