उत्तराखंड सीड्स एवं तराई डेवलेपमेंट कारपोरेशन (टीडीसी) वर्तमान में बुरे दौर से गुजर रहा है। एक क्षय रोगी की भांति टीडीसी की दिन-प्रतिदिन हालत खस्ता हो रही है वहीं विभाग के कर्मचारियों में भी भारी असंतोष की भावना घर कर रही है।
टीडीसी को जहां किसानों के बीज का 22 करोड़ रुपये का भुगतान करना है वहीं विभाग के कर्मचारियों का तीन महीने का वेतन भी अभी टीडीसी नहीं दे पाया है। हालात खराब होते देख विभाग के आला अधिकारियों ने इस दिशा में जल्द ही सरकार के समक्ष साफ्ट लोन की दरकार रखी है। अगर यह लोन राज्य सरकार की ओर से नहीं मिला तो वह दिन दूर नहीं जब टीडीसी में ताले लटक जाएंगे।
एक समय में बेहतर आय का जरिया माना जाने वाला उत्तराखंड सीड्स एवं तराई डेवलेपमेंट कारपोरेशन काफी मजबूत स्थिति में था। वर्ष 2010-11 में टीडीसी ने रिकार्ड कायम किया किया था। उस समय विभाग ने 11.92 करोड़ रुपये की वास्तविक आय बचत हुई और कर पूर्व 3.05 करोड़ रुपये का लाभ हुआ।
उस दौरान निगम के बीजों का व्यवसाय अन्य राज्यों में फैलाने और आय संवर्द्धन के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों में आवश्यक स्थानांतरण आदेश निर्गत किए गए और उनका दायित्व भी निर्धारण किया गया, लेकिन एकाएक दो-तीन वर्षों में टीडीसी की आर्थिक स्थिति में लगातार गिरावट आनी शुरू हो गई।
इसके पीछे विभाग के ही कुछ सूत्र बताते हैं कि विभाग की आय अर्जित करने के लिए कोई योजना तैयार ही नहीं की गई, किस तरह से विभाग की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना है इस पर गौर कम ही किया गया।
बता दें कि वर्ष 2010-11 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक सरकार में टीडीसी के चेयरमैन पद पर वरिष्ठ भाजपा नेता हेमंत द्विवेदी की ताजपोशी की गई थी। उनके कार्यकाल में टीडीसी भले ही चर्चाओं में रहा हो, लेकिन विभागीय आंकड़ों पर देखा जाए तो टीडीसी की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हुई।
वर्ष 2010-11 में ट्रांसर्पोटेशन खर्चों को भी कम करने के लिए नई पहल करके प्रयोग के तौर पर 53,010 क्विंटल गेहूं बीजों को रेलवे के माध्यम से बिहार भेजा गया था और ट्रांसर्पोटेशन खर्चे में करीब 20 लाख रुपये की विभाग को बचत भी हुई। यही नहीं यूपी से वसूली जाने वाली करीब दो करोड़ रुपये की धनराशि रिकवर करके निगम के खातों को मजबूत किया गया था।
फिलहाल वर्तमान दौर में जो हालात अब टीडीसी के चल रहे हैं वह अच्छा संकेत नहीं दे रहे हैं। अब सिर्फ राज्य सरकार की मेहरबानी पर ही कर्मचारियों का वेतन और टीडीसी के ऊपर लटक रहा खतरा सिर्फ और सिर्फ साफ्ट लोन से ही टल पाएगा।
पिछले डेढ़-दो सालों में विभाग की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर हो गई है। वर्ष 2014-15 में बेमौसमी बारिश ने गेहूं के बीज को बुरी तरह से बर्बाद कर दिया था, इससे विभाग को 14 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हुआ। क्योंकि बीज में गुणवत्ता की खराबी पाई गई। फिलहाल कर्मचारियों के वेतन दिलाने के लिए राज्य सरकार से साफ्ट लोन के लिए आवेदन किया गया है। जल्द ही इस दिशा में सरकार की ओर से उचित कार्रवाई होगी। उम्मीद है राज्य सरकार विभाग को साफ्ट लोन दे देगी।
- पीएस बिष्ट, एमडी टीडीसी, पंतनगर
मेरे कार्यकाल में टीडीसी की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत थी। साथ ही कर्मचारियों को मिलने वाले सभी भत्तों का भी तय समय से भुगतान किया गया। वर्ष 2010-11 में विभाग 3.05 करोड़ के लाभांश में था। विभाग के ट्रांसर्पोटेशन खर्चों में भी कटौती करके विभाग को 20 लाख रुपये का मुनाफा भी पहुंचाया गया। यूपी एग्रो पर विभाजन के दौरान दो करोड़ रुपये बकाया था, उसे भी वसूला गया। निगम की आय को और मजबूत किया गया। कर्मचारियों की ग्रेच्युटी बढ़ाकर 3.5 से बढ़ाकर 10 लाख किए जाने की कार्रवाई भी गतिमान की गई थी।
- हेमंत द्विवेदी, पूर्व चेयरमैन टीडीसी, पंतनगर