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जारी रहेगी शौर्य के लिए ‘शौर्य’ की जंग

Wed, 07 Aug 2013 01:51 PM IST
आगरा/ब्यूरो
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घर, आंगन उनकी यादों से भरा है। हर चीज में उनसे जुड़ी एक खूबसूरत याद बसती है। इसलिए वे निर्जीव होकर भी संध्या के लिए सजीव हो गई हैं।
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तब से वह कुछ नया लाई ही नहीं पर एक खाली केस ने मां-बेटे की जिंदगी रीती कर दी है। जब-जब उसे खोलते हैं, मन के कोने में बंद पड़ी पीड़ा भी खुल जाती है। वो केस संध्या के पति के शौर्य का है पर उसमें पदक नहीं है। इसे छीनने वाले गैर नहीं, अपने ही हैं। अपने बेटे शौर्य के लिए पिता के ‘शौर्य’ की जंग लड़ रही हैं संध्या।

हालात ने उन्हें हिम्मत दी और शौर्य ने संबल।

शौर्य चक्र विजेता शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल आरएस मान की पत्नी डॉ. संध्या मान की आपबीती झकझोर देने वाली है। बेटी को स्थापित करने को माता-पिता अपनी जड़ों से उखड़ उसके पास चले आए।
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आगरा कॉलेज में फिजिक्स डिपार्टमेंट की असिस्टेंट प्रो. संध्या मान विनायक विहार, शमशाबाद में रहती हैं। हमारे आने की उन्हें खबर थी। सुबह से ही मन भारी था।

उन्होंने बताया कि 1996 में शादी हुई थी। 2001 में लालगढ़ चट्टान, गंगानगर में उनकी आखिरी पोस्टिंग थी। वहीं पर आपरेशन रक्षक हुआ। आतंकवादियों से मुठभेड़ में उनको दो गोलियां लगीं पर वह लड़ते रहे।

उसके बाद दो साल हास्पिटल में रहे। कुछ समय तक ठीक रहे पर 2010 में पेट में तकलीफ बहुत बढ़ गई। 10 जुलाई को हमने उन्हें खो दिया। हालात ने रोने का मौका भी नहीं दिया। उस समय शौर्य 8 साल का था।

डेढ़ महीने बाद मैं ससुराल करनाल, हरियाणा से आगरा आ गई। यहीं पर जॉब करती थी। डेढ़ महीने तक आर्मी से कोई चिट्ठी नहीं आई। ससुराल वालों ने डाक्यूमेंटेशन में मेरा नाम लिखकर पता करनाल का दे दिया। उनकी यूनिट से सारा सामान, शौर्य चक्र ले आए।

शुरुआत में मिलने वाला पैसा भी उनके पास चला गया। देवर ने फर्जी साइन कर मेरे और उनके एकाउंट से सारे पैसे निकाल लिए। अगस्त में आर्मी को सच पता चला। उन लोगों ने लॉकर सील कर दिया। एक नौबत ऐसी आई जब मेरे पास दूध तक के पैसे नहीं थे।

अगर आज मेरा बेटा और मैं जिंदा हैं तो आर्मी की वजह से। उन लोगों ने केस कर रखा है। उसी को लड़ रही हूं और लड़ूंगी अपने बेटे के हक के लिए, शौर्य चक्र के लिए। शौर्य मेरे लिए सूरज की तरह है जिसके चारों ओर मेरी सारी जिंदगी घूमती है।

मैं चाहती हूं शौर्य आर्मी में जाए। वैसा ही बने, जैसे उसके पापा थे। जो मैंने खोया है, उसे इस रूप में वापस पाना चाहती हूं। शौर्य नेवी जॉइन करना चाहता है। उसे पानी से प्यार है।


नहीं भरते वक्त के साथ जख्म
शादी के बाद आगरा लेकर आए थे। यही पर उनकी 2 पैरा में पोस्टिंग थी। जाने से एक साल पहले जिद करके मुझे वापस यहां भेजा। बोले, तुम आत्मनिर्भर बनो। कभी-कभी जिंदगी एक सर्किल बन जाती है। उनके जैसा साहस किसी में नहीं देखा। पहले इजहार ही नहीं करती थी पर आज कहती हूं ‘आई मैडली लव हिम’। जो उनको पसंद था, वह सब करती हूं।

... तो तुम भी कुछ पहनोगी गले में
एक कागज हाथ में आया और संध्या मुस्कुरा उठीं। बोलीं, २६ जनवरी २००२ में इनको शौर्य चक्र मिलना था। उससे पहले मेरे लिए पैंडेंट दिलाया। बोले, जब मैं शौर्य चक्र पहूनंगा, तुम इसे पहनना।

अपने से ज्यादा मम्मी का ख्याल रखना
आरएस मान ने आखिरी बातचीत अपने बेटे से की थी। शौर्य ने बताया पापा ने कहा, हमेशा फस्र्ट आना। अपने से ज्यादा मम्मी का ख्याल रखना। शौर्य यही कर रहा है।

डेढ़ साल तक जागती रही आंखें
डेढ़ साल तक घर में ही बंद रही। पूरी रात जागकर काटती। नींद ही नहीं आती थी। आर्मी से रिटायर्ड पिता कृष्णा प्रताप और मां राजेश एक महीने के लिए बरेली से यहां आए लेकिन बेटी का हाल देख हमेशा के लिए यहीं रह गए। पिता ने बताया कि मैं इसे थपकियां देकर सुलाता था। पूरी तरह से टूट गई थी। हम दोनों ने संभाला। बोले, संध्या एमएससी फिजिक्स में गोल्ड मेडलिस्ट है। सुपर हार्स राइडर रह चुकी है। बेटी के हुनर का हर दस्तावेज पिता ने संभालकर रखा है।

मौत से लड़ गए आरएस मान
लेफ्टिनेंट कर्नल आरएस मान के शौर्य के आगे शब्द बहुत बौने हैं। १८ अप्रैल २००१ को कमांडो यूनिट (९०० हावर्स) के टीम कमांडर रंजीत सिंह मान को सूचना मिली कि कुछ आतंकवादी खबाल ढोक्स कठुआ, जम्मू कश्मीर को छोड़ रहे थे। उन्होंने अपनी टीम को चार आतंकवादियों को कवर करने का निर्देश दिया।

खुद अकेले चोटी पर चढऩे लगे ताकि आतंकवादी सीमा पार न कर सकें। उन्होंने एक आतंकवादी को ढेर कर दिया लेकिन उसी वक्त दूसरे ने उनके पेट में गोली मार दी। लहूलुहान होने के बावजूद वह लड़ते रहे और दूसरे आतंकवादी को भी ढेर कर दिया।
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दुश्मनों ने उन्हें बुरी तरह से घायल कर दिया। उस समय संध्या 9 माह की गर्भवती थी। आरएस मान के बचने केबहुत कम चांस थे पर वह मौत से लड़ गए। उनकी जिंदगी के 9 साल शौर्य के लिए उपहार थे।

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