4 जून 1988 को जन्मे प्रमोद का ताल्लुक वैसे तो बिहार से है। मगर वो और उनका परिवार ओडिशा के बरगढ़ जिले के अट्टाबीरा में रहता है। पांच साल की उम्र में पैर में पोलियो होने के बाद वह इलाज के वास्ते ओडिशा चले गए थे। पोलियो होने के बाद भी प्रमोद का बैडमिंटन के प्रति प्यार कभी कम नहीं हुआ। टोक्यो में बेहतरीन प्रदर्शन के बाद प्रमोद ने न सिर्फ देश और ओडिशा बल्कि बिहार का भी मान बढ़ाया है। बैडमिंटन के प्रति उनका जुनून इस कदर था कि वो कई घंटे तक अभ्यास करते थे। शुरुआती समय में उन्होंने जिला स्तर पर कई टूर्नामेंट जीते। फिर पैरा-बैडमिंटन की ओर रुख किया। इसके बाद प्रमोद ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पर कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। 2018 पैरा एशियाई खेलों में उन्होंने एक सिल्वर और एक ब्रॉन्ज मेडल जीता था। विश्व चैंपियनशिप में वो चार गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। कुल मिलाकर प्रमोद ने अब 45 अंतरराष्ट्रीय पदक अपने नाम किए हैं।
स्वर्ण पदक जीतने के बाद प्रमोद ने कहा, 'यह मेरे लिए बहुत ही गर्व का क्षण है। मैं भारतीय बैडमिंटन समुदाय और समग्र रूप से भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं। यह पहली बार है कि पैरा बैडमिंटन पैरालंपिक खेलों का हिस्सा बना है और भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतना मेरे लिए यादगार पल है।' उन्होंने कहा, 'मैंने दो साल पहले जापान में इसी प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ खेला था और मैं हार गया था। वह मेरे लिए सीखने का मौका था। आज वही स्टेडियम और वही माहौल था। मैंने जीतने की रणनीति बनाई। मैं इसके लिए बहुत दृढ़ निश्चयी था।'