बाएं हाथ से पिस्टल पकडने में होती थी मुश्किल
19 साल के मनीष खुलासा करते हैं कि उन्हें फुटबॉल बहुत पसंद थी। वह इसी में अपना करियर बनाना चाहते थे, लेकिन हाथ में चोट लगने के बाद उनके पिता अपने दोस्त को कहने पर बल्लभगढ़ में कोच राकेश के पास लेकर गए। उनका दांया हाथ काम नहीं करता था तो बांए हाथ से पिस्टल पकडनी होती थी। शुरुआत में काफी दिक्कत आई लेकिन एक बार आदत पड़ गई तो सब ठीक होता गया। शूटिंग आगे जारी रखने के लिए उन्हें पिस्टल की जरूरत थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर के लिए मोरनी की पिस्टल चाहिए थी। पिता का छोटे-मोटे पुर्जे बनाने का काम था। इससे पिस्टल नहीं आनी थी। पिता के पास एक छोटा मकान था। उन्होंने इसे सात लाख रुपये में बेचकर उन्हें तकरीबन उन्हें पिस्टल दिला दी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
शूटिंग से पिता का बने सहारा
बीए द्वतीय वर्ष के छात्र मनीष के कोच जेपी नौटियाल के मुताबिक मनीष के घर के हालात ऐसे थे उनके पिता उन्हें पिस्टल नहीं दिला सकते थे। जिसके चलते उन्हें साल 2015 में अपना मकान बेचना पड़ा। उस वक्त उनके लिए यह फैसला काफी कड़ा था, लेकिन मनीष ने दो साल के अंदर ही 2017 में जूनियर विश्व कीर्तिमान रचकर विश्व कप में स्वर्ण पदक जीता। जब उन्हें बीते वर्ष अर्जुन अवार्ड जीता तो पिता ने भी अपने काम को बढ़ा लिया।