रियो ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतने वाली पीवी सिंधु और साक्षी मलिक पर पैसों की खूब बारिश हो रही है। देश में इन दोनों खिलाड़ियों की जीत का श्रेय लेने की होड़ मची है, लेकिन भारत को ओलंपिक खेलों में पहला व्यक्तिगत पदक दिलाने वाले पहलवान के डी जाधव को लोगों ने भुला दिया है। रिकॉर्ड बुक में दर्ज उनके नाम को मिटा पाना मुश्किल है लेकिन उनके बारे में लोगों को कोई जानकारी नहीं है। लोगों के लिए कुश्ती के हीरो सुशील कुमार हैं न कि के डी जाधव, यहां तक कि लोगों को उनका पूरा नाम भी नहीं मालूम।
इसकी वजह क्या है, वजह सिर्फ एक है कि कुश्ती के कर्ताधर्ता नेताओं ने उनकी पहचान ही नहीं बनने दी। आज स्थिति यह है कि उनकी एक अच्छी सी तस्वीर भी लोगों के पास उपलब्ध नहीं है। किसी भी खेल संघ का काम होता है कि वह आने वाली पीढ़ी को अतीत के खिलाड़ियों की उपलब्धियों से रूबरू करवाए ताकि उनके अंदर यह विश्वास पैदा हो सके कि हमसे पहले लोगों ने बगैर पर्याप्त संशाधनों के ओलंपिक जैसे खेलों में सफलता हासिल की तो वो ऐसा क्यों नहीं कर सकते?
1952 में भारत को हेलसिंकी ओलंपिक में कांस्य पदक जिताने वाले दादासाहेब जाधव 44 साल तक देश के अकेले व्यक्तिगत पदक विजेता रहे, उन्हें उस दौर में ‘पॉकेट डायनमो’ के नाम से भी जाना जाता था। लेकिन आज उनकी पहचान आज सिर्फ सामान्य ज्ञान की किताबों तक सीमित रह गई है। उन्होंने किस तरह लोगों से पैसे मांगकर ओलंपिक में भाग लिया, यह कहानी भी लोगों को नहीं मालूम है। ओलिंपिक खेलों में वह क्वालिफाई तो कर चुके थे, लेकिन वहां पहुंचने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे तक नहीं थे।
जाधव ने हेलसिंकी जाने के लिए सरकार से मदद मांगी, लेकिन तत्कालीन मुंबई के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने उनसे पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने अपने परिवार के साथ मिलकर इस यात्रा के लिए राशि जुटाई।
राज्य सरकार ने उनके लगातार आग्रह के बाद उन्हें 4000 रुपए की छोटी सी राशि दे दी। जाधव राजाराम कॉलेज में पढ़ा करते थे, उस कॉलेज के प्रिंसिपल खरडिकर ने उनकी लगन देखकर उन्हें 7000 रुपए की आर्थिक मदद दे दी और उनका हेलसिंकी जाने का रास्ता खुल गया। वह लोगों की आशाओं पर खरे उतरे और ओलंपिक से कांस्य पदक लेकर लौटे। दुःख तो तब होता है जाधव के इकलौते पुत्र रणजीत सिंह कहते हैं कि उनके पिता की इस महान उपलब्धि को सरकार ने कभी उचित सम्मान नहीं दिया।
आखिर खेलों के रहनुमा बने बैठे नेता कब तक खिलाड़ियों को नजरअंदाज करते रहेंगे। यदि सरकार और खेल संघों ने सही समय पर खिलाड़ियों को सम्मान दिया होता तो आज भी देश को एक-एक पदक के लिए ओलंपिक में मोहताज नहीं होना पड़ता। ओलंपिक से कांस्य पदक जीतकर वापस आने पर जाधव ने कई कुश्ती प्रतियोगिताओं को जीतकर लोगों के पैसे वापस किए। गरीबी एवं संघर्ष के बावजूद खुद्दारी में जीवन जीते हुए केडी जाधव की मौत 1984 में सड़क दुर्घटना में हो गई।
यह महज आश्चर्य ही नहीं बल्कि शर्म की बात है कि ओलंपिक पदक के 50वें साल और उनकी मृत्यु के 15 साल बाद 2001 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
दुर्भाग्य की बात यह भी है कि जाधव देश के अकेले ओलंपिक पदक विजेता हैं जिन्हें आज तक कोई पद्म सम्मान नहीं दिया गया। अब समय आ गया है कि खेल संघों को नेताओं के चंगुल से मुक्त कराया जाए और खेलों की कमान खिलाड़ियों के हाथों में दे दी जाए जिससे खिलाड़ियों के साथ-साथ खेलों का विकास हो सके। यदि आपको लगता है कि खेल संघों को नेताओं के चंगुल से मुक्त कराना है तो अमर उजाला की “नो पॉलिटक्स इन ओलंपिक्स” मुहिम का समर्थन करें।
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