डोपिंग को लेकर जागरूकता के बड़े दावे भले किए जाएं, लेकिन सच्चाई यह है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधत्व करने वाले ज्यादातर खिलाड़ी एंटी डोपिंग नियमों से अंजान हैं।
पैरा एशियाड खेलों में गोल्ड जीतने वाले नारायण ठाकुर के बाद ऐसा मामला फिर सामने आया है, जिसमें डॉक्टर और खिलाड़ी को एंटी डोपिंग नियमों की जानकारी नहीं होने का खामियाजा ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए कांस्य पदक जीतने वाली जुडोका को भुगतना पड़ा है।
नारायण ठाकुर को तो पूर्व प्रभावी थेराप्यूटिक यूज एक्जंप्शन (टीयूई) के चलते डोपिंग के आरोपों से मुक्त कर दिया गया, जिससे उनका पैरा एशियाई खेलों का पदक बच गया, लेकिन अब ऐसे ही आरोपों में पंजाब की जुडोका राजविंदर कौर फंस गई हैं।
नारायण की तरह उनके यूरिन सैंपल में बीटा टू एगोनिस्ट टरब्यूटलाइन पाया गया है। उन्हें भी डॉक्टर ने खांसी की दवा लिखकर दी थी, लेकिन इसमें प्रतिबंधित दवा मिली होने के कारण उन्हें टीयूई लेने की सलाह नहीं दी।
जकार्ता एशियाई खेलों में खेलने वाली राजविंदर के अनुसार उन्हें खुद नहीं मालूम था कि टीयूई क्या होता है? उन्हें कभी कैंप में कोचेज ने या फिर फेडरेशन इस बारे में जागरूक नहीं किया गया। लेकिन उन्होंने नेशनल कैंप में की गई सैंपलिंग के दौरान डोप कंट्रोल फॉर्म पर इस दवा का उल्लेख कर दिया।
उन्हें अगर टीयूई के बारे में मालूम होता तो वह इसके लिए पहले ही आवेदन कर देतीं। हालांकि उन्होंने अब जानकारी लेकर पूर्व प्रभावी टीयूई का आवेदन किया है। साथ ही खुद अस्थाई प्रतिबंध के लिए हामी भरी।
जागरूकता को लेकर नहीं निभाई जा रही जिम्मेदारी
नाडा की ओर से हर माह विभिन्न स्थानों पर जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन नेशनल कैंपों में इनकी कमी देखी गई है। यहां तक खेल संघ और टीम से जुड़े कोच भी अपनी जिम्मेदारी को इस दिशा में सही ढंग से नहीं निभा रहे हैं।
नारायण के बाद राजविंदर का मामला इसका उदाहरण है। नारायण को तो डोपिंग के आरोपों से मुक्त कर दिया गया, लेकिन राजविंदर के मामले में नाडा पैनल सुनवाई को किस तरह लेता है यह देखने वाली बात होगी।