श्रेया ने नौ साल की उम्र में अपने बड़े भाई की देखा-देखी फेंसिंग की तरफ कदम बढ़ाया था। इससे पहले वह ताइक्वांडो में दिलचस्पी रखती थीं, लेकिन फेंसिंग में आने के बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस वक्त एक कान्वेंट स्कूल में नौंवी कक्षा की छात्रा श्रेया एमए स्टेडियम में स्पोर्ट्स कौंसिल के कोच छोटू लाल से कोचिंग ले रही हैं। उनका सपना एक दिन देश के लिए ओलंपिक को गोल्ड जीतने का है।
टाइम मैनेजमेंट से मिलती है कामयाबी
बकौल श्रेया कामयाबी का सीधा सा फंडा टाइम मैनेजमेंट से जुड़ा है। पढ़ाई और प्रैक्टिस में एडजस्टमेंट बढ़ाकर दोनों संभव हो जाते हैं। विदेशी खिलाड़ियों के मूव्स पसंद करने वाली श्रेया आगे बढ़ने के लिए परिवार के सपोर्ट को भी बेहद जरूरी मानती हैं। आर्किटेक्ट पिता संजय गुप्ता और मां रश्मि महाजन को वह इसके लिए शुक्रिया अदा करना नहीं भूलतीं। उनका मानना है कि लगन हो तो किसी भी फील्ड में कोई भी मंजिल पाई जा सकती है।