उन्होंने कहा, 'मां बीमार हो अमूमन लड़कियों को घर का काम संभालने की नसीहत दी जाती है। मैंने जब खेलना शुरू किया तो मेरी मां को लीलावती देवी को गठिया हो गया था। घर में दिक्कत थी कि काम कौन करे? मैं हॉकी खेलती थी और मेरी मां कतई नहीं चाहती घर के काम में उलझ कर रह जाउं। उन्होंने मुझे हॉकी खेलने के लिए बाहर भेज दिया। मेरे पिता महेन्द्र सिंह फॉर्मेसिस्ट हैं और उन्होंने मेरी मां का साथ दिया। यदि कोई मुझसे पूछे की मैं हॉकी मैं इस मुकाम तक कैसे तो मैं अपने दादा स्वर्गीय रणजीत सिंह के कारण ही यहां तक पहुंची। दादा रणजीत सिंह ही चाहते थे कि मैं हॉकी खेलूं और मैंने हॉकी खेल कर उनका ही सपना पूरा किया। मुझे आज जब अर्जुन अवॉर्ड दिया गया तो मुझे सबसे ज्यादा कमी अपने दादा रणजीत सिंह की अखर रही है। मैंने भारत के लिए 2009 में खेलना शुरू कर दिया था और तब मेरे दादा जिंदा थे। मेरे दादा का 2013 में निधन हो गया लेकिन मैं हर कामयाबी में उन्हें याद रखती हूं।'
सविता कहती हैं, 'मेरे लिए मेरे अतर्राष्ट्रीय करियर में भारत को 2017 में जापान में महिला एशिया कप के फाइनल में चीन के खिलाफ शूटआउट में शानदार बचाव कर खिताब जिताना हमेशा याद रहेगा। साथ ही भारत को 2016 के रियो ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई कराने में योगदान करना भी याद रहेगा। हम भले ही जापान से जकार्ता में एशियाई खेलों के फाइनल में महज एक गोल से हार कर स्वर्ण पदक जीतने से चूक गए लेकिन हमारी टीम ने पिछले करीब एक डेढ़ बरस से लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया। भारत की महिला हॉकी खिलाडिय़ों की कोर ग्रुप की खिलाडियों का ओलंपिक क्वॉलिफाइंग के लिए शिविर एक अक्टूबर से शुरू हो रहा है। हमारी महिला हॉकी टीम जितनी बढिय़ा है उससे मुझे उसके टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वॉलिफाई करने का पूरा भरोसा है।'