इससे हमें सकारात्मक ऊर्जा मिली और फिर हमने बैठक की। हमने कहा कि हमें एक और मौका मिला है और अगर हम खाली हाथ लौटते हैं तो हमें जीवन भर यही पछतावा रहेगा। हमने अपने आप से कहा कि हमारे हाथ में 60 मिनट हैं और अगर हम इन 60 मिनटों में अपना सर्वश्रेष्ठ दें तो हम अपने चेहरे पर मुस्कान के साथ देश लौट सकते हैं।’ भारत ने ओलंपिक में आठ स्वर्ण पदक जीते हैं। उसने आखिरी पदक 1980 के मास्को खेलों (स्वर्ण) में जीता था। मनप्रीत ने कहा कि बहुत अच्छा लग रहा है।
यह मेरा तीसरा ओलंपिक था और इस बार मैं टीम का कप्तान था। मेरा पहला ओलंपिक 2012 में काफी निराशाजनक रहा था क्योंकि हमने कोई मैच नहीं जीता था। लेकिन फिर हमने सुधार किया और एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीते। हमने 2016 में अच्छा खेला लेकिन क्वार्टर फाइनल की बाधा को पार नहीं कर सके। इस बार हमारी मानसिकता अलग थी क्योंकि हमने काफी मेहनत की थी। हमने बंगलूरू में एक साथ समय बिताया था। परिसर के अंदर एकांतवास पर थे। हम सभी दूसरों से अलग थे। इसलिए ओलंपिक में जाने से पहले हमारा विचार था कि हमने बहुत त्याग किया है।
अगर हम अपना सर्वश्रेष्ठ देंगे तो हम निश्चित रूप से पदक जीत सकते हैं। यह एक युवा टीम थी और इसलिए मानसिकता काफी मजबूत थी। अनुभवी खिलाड़ियों के रूप में हमने युवाओं से अपना अनुभव साझा किया। हमारी मानसिकता थी कि हमें किसी भी टीम को कम नहीं आंकना चाहिए क्योंकि यह ओलंपिक है और सभी टीमें उस मंच पर अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करती हैं। हमने हर मैच में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया और एक बार में एक मैच पर ध्यान दे रहे थे।