1936 का बर्लिन ओलंपिक 31 वर्षीय हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का तीसरा और आखिरी ओलंपिक था। क्योंकि उन्होंने उसके बाद रिटायर होने का फैसला कर लिया था। 1928 का एम्सटर्डम ओलंपिक, 1932 का लॉस एंजेल्स ओलंपिक के बाद निस्संदेह उनकी क्षमता को देखते हुए 1936 के बर्लिन ओलंपिक में उन्हें भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी सौंपी गई और इस ओलंपिक में भी भारत ने विजय प्राप्त की।
नए नए कप्तान बनने के बाद ध्यानचंद पर लगातार तीन बार स्वर्ण पदक जीतने का दबाव भी था। एम्सटर्डम और लॉस एंजिल्स में टीम इंडिया हॉकी में स्वर्ण पदक जीत चुकी थी। बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद को कप्तानी सौंपने को लेकर कोई असहमति नहीं थी। उन्होंने कप्तान बनने के बाद शानदार खेल का प्रदर्शन किया और ओलंपिक में गोल्ड मेडल की हैट्रिक पूरी कर दी।
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गौरतलब है कि 1936 के ओलंपिक खेल शुरू होने से पहले ही एक अभ्यास मैच में भारतीय टीम जर्मनी से 4-1 से हार गई थी। लेकिन इस हार के बाद भी ध्यानचंद जरा भी नहीं डगमगाए। भारत ने बर्लिन ओलंपिक में शुरुआती अभ्यास मैच गंवाने के बाद अगले चरण में अपने सभी तीन लीग मैच जीते। भारत ने पहले मैच में हंगरी को 4-0 से हराया। इसमें ध्यानचंद ने एक भी गोल नहीं किया। दूसरे मैच में अमेरिका को 7-0 से हराया। इसमें ध्यानचंद ने 2 गोल किए।
तीसरे मैच में जापान को 9-0 से हराया। इसमें ध्यानचंद ने 4 गोल किए। फ्रांस को सेमीफाइनल में टीम इंडिया ने 10-0 से करारी मात दी। इसमें ध्यानचंद ने 4 गोल किए। जर्मनी को फाइनल में टीम इंडिया ने 8-1 के अंतर से हराया। इसमें ध्यानचंद ने 3 गोल किए। इस ओलंपिक में जर्मनी के खिलाफ मैच में गोलकीपर टीटो वर्नहोल्टज से टकरा कर ध्यानचंद के दांत भी टूट गए थे। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद की उम्र 31 साल थी। इसके बाद भी उनकी हॉकी गोल बरसाती रही। इस ओलंपिक में ध्यानचंद ने 13 गोल किए।
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मेजर ध्यानचंद 'दद्दा' को भारत और विश्व हॉकी के क्षेत्र में सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में शुमार किया जाता है। ध्यानचंद की महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक बार वह बर्लिन में तीसरे दर्जे के डिब्बे में बैठकर यात्रा की। काफी ठंड के बीच यह यात्रा बहुत कठिन थी। लेकिन देश की सेना के सच्चे सिपाही ध्यानचंद ने इस यात्रा को भी देश विजय की दिशा में एक मिशन माना।
ध्यानचंद ने अपनी हर यात्रा को इसी तरह का मिशन माना। उन्होंने अपने साथियों से भी कहा कि देश की मान और प्रतिष्ठा को सदैव ऊंचा रखने के लिए हमेशा हर मैच को जीतने की कोशिश करनी चाहिए। उनके पूरे व्यक्तित्व का आकलन करने के बाद कहा जा सकता है कि ध्यानचंद सिर्फ देेश के लिए ही बने थे।
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