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हॉकी नहीं शाहिद की ड्रिब्लिंग देखने आते थे लोग

Wed, 20 Jul 2016 05:31 PM IST
सत्येन्द्र पाल सिंह/अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : Twitter
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मोहम्मद शाहिद मॉडर्न हॉकी के बेहतरीन ड्रिब्लर। आला इंसान। दोस्तों के दोस्त। एक ऐसा बेहतरीन खिलाड़ी की उनकी हॉकी की कलाकारी पर साथी तो साथी उनके प्रतिद्वंद्वी तक मुरीद हो जाए।
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मोहम्मद शाहिद से जो जितनी बार भी मिला उनके मुरीद होते चला गया। बनारस नगरी के बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का जिस तरह से भारत का हर खासोआम मुरीद था उतने ही हॉकीप्रेमी हमेशा शाहिद की हॉकी की कलाकारी के मुरीद रहे।

शाहिद तो मेरे तो लगभग हमउम्र रहे। वह उ. प्र. स्पोटर्स हॉस्टल की देन हैं। जैसे-जैसे उनका हॉकी का करियर बढ़ा वैसे-वैसे मैं भी बतौर खेल पत्रकार उनका मुरीद होता चला गया। 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए भारतीय हॉकी टीम का कैंप दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में लगा। तब मैंने शाहिद से देश के एक बड़े हिंदी अखबार के लिए पहला बड़ा इंटरव्यू किया। इसमें शाहिद से ओलंपिक में भारत पर दबाव की बाबत पूछा तो वह अपने अलमस्त बनारसी अंदाज में बोले थे कि सामने दुनिया की कोई भी टीम हो डर कहे का, कोई जंग थोड़े लडनी है, खेलनी तो हॉकी ही है।
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हॉकी मैदान पर शाहिद की ड्रिब्लिंग को देखने के लिए हॉकी मुरीद दुनिया के हर कोने में जुड़ते थे। वह गेंद को लेकर अकेले ही गेंद को ड्रिबल करते हुए चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, स्पेन, नीदरलैंड और इंग्लैंड की टीमों की मजबूत से मजबूत रक्षापंक्ति को छका देते थे। शाहिद गोल करने के लिए हमेशा कलाइयों से तेजी से गेंद को फ्लिक या पुश करते थे। यह बहुत कम देखा कि कभी उन्होंने डी में पहुंच कर हिट लगाकर गोल किया हो। वह करीब एक दशक से ज्यादा तक भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय हॉकी खेले। शाहिद की ड्रिब्लिंग से पंजाब से आने वाले हॉकी कोच हमेशा परेशान रहे। एक खास वर्ग के शाहिद के आलोचकों ने उन पर हमेशा यह आरोप लगाया कि वे बेवजह गेंद को ड्रिबल करते हैं।

शाहिद से जब-जब इस बाबत मेरी चर्चा होती तो वह कहते मैं तो गेंद को तभी तक ड्रिबल करता हूं जब तक साथी खिलाड़ी गेंद को लेने नहीं पहुंचता। वह कहते थे कि मेरा पास इतना तेज होता था कि अक्सर कई साथी खिलाड़ी रफ्तार से पिछड़ जाते थे। उन्होंने बराबर कहा कि ड्रिब्लिंग मेरी ताकत है लेकिन उन्होंने हमेशा इसका इस्तेमाल टीम की बेहतरी के लिए किया है।

उनके पेनल्टी कॉर्नर को भुनाने के लिए नहीं था कोई ड्रैग फ्लिकर

मोहम्मद शाहिद
दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन डिफेंस को डॉज देने वाले शाहिद बीमारी को डॉज नहीं दे पाए और बुधवार 56 बरस की उम्र में दुनिया को अलविदा कह कर चले गए। शाहिद उन विरले भारतीय हॉकी खिलाड़ियों में से एक हैं, जिन्होंने घास के मैदान के साथ एस्ट्रो टर्फ पर बहुत ही कारगर ढंग से गेंद को ड्रिबल कर गोल करने के साथ अपने लंबे करियर में बराबर गोल करने के बेहतरीन मौके मिले। पेनल्टी कॉर्नर दिलाना तो उनके हमेशा बाएं हाथ का खेल रहा।

भारत की बदकिस्मती यह रही कि उनके जमाने में भारत के पास पेनल्टी कॉर्नर को भुनाने वाला आज की तरह कोई ड्रैग फ्लिकर नहीं था। 56 वर्षीय शाहिद ने हॉकी का शुरुआती पाठ बनारस से स्पोटर्स हॉस्टल आने के बाद पूर्व ओलंपियन मरहूम झमनलाल शर्मा से सीखा। शाहिद ने हमेशा झमन लाल जी को कोच साहब कर ही संबोधित किया। शाहिद के बनारस के साथ उनके सबसे बढिय़ा जोड़ीदार मोहम्मद नईम रहे। ये दोनों रेलवे के लिए बहुत साथ साथ खेले। भारतीय टीम में भी ये दोनों ढाका में एशिया कप में साथ खेले।
 
1989 में ग्वालियर में सीनियर राष्ट्रीय पुरुष हॉकी चैंपियनशिप में शाहिद भारतीय रेलवे के लिए खेले। तब रेलवे की टीम के कोच मौजूदा हॉकी चयनकर्ता पूर्व ओलंपियन हरबिंदर सिंह थे। तब रेलवे की टीम क्वॉर्टर फाइनल में ग्वालियर रामप्रकाश सिंह की अगुवाई में खेलने वाली उत्तर प्रदेश से हार गई। शाम को मैच के बाद शाहिद से मुलाकात हुई तो बोले, अरे भाई आज तो हद हो गई कि बेगम से भी सुनना पड़ गया।

शाहिद ने कहा, बेगम (परवीन) बोली, क्या बड़े खिलाड़ी हो, मियां। आप तो भांजे (मोहम्मद नासिर) से भी हार गए। तब शाहिद के भांजे नासिर उत्तर प्रदेश की उस टीम में थे जिसमें रामप्रकाश सिंह सहित रेलवे के कई ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें टीम में जगह नहीं मिली थी।
 
मोहम्मद शाहिद की बाबत एक बात का जिक्र जरूर करना चाहूंगा। बनारस की गलियों में हॉकी खेल कर अपने हॉकी को निखारा। बनारस की पहचान गंगा तहजीब की है। शाहिद ने भारत के लिए खेलने उतरने पर हमेशा तिरंगे के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। इस बात को इस तरह बयां किया जा सकता है कि वह बतौर फॉरवर्ड अरबी घोड़े की रफ्तार से गेंद लेकर दौड़ते और उसी तेजी से फ्लिक करते थे। अफसोस यह की साथी खिलाड़ी पिछड़ जाते थे।

शाहिद के करीबी अक्सर यह जिक्र करते हैं कि भारत की टीम यदि पाकिस्तान से किसी मैच में हार जाती तो शाहिद की मां घर में खाना नहीं पकाती है। पाकिस्तान के खिलाफ शाहिद ने हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। पाकिस्तान के खिलाफ नतीजा चाहे जो भी रहा हो शाहिद का खुद का प्रदर्शन हमेशा लाजवाब रहा।
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जफर इकबाल के साथ खूब चली शाहिद की 'जुगलबंदी'

मैदान पर लेफ्ट इन शाहिद के सबसे बड़े कामयाब जोड़ीदार लेफ्ट आउट जफर इकबाल। जफर के साथ उनकी जुगलबंदी ऐसी थी कि दोनों को मालूम होता था कब किसे डॉज देकर गोल करना है। भारत की बदकिस्मती यह रही कि इन दोनों के वक्त भारत का केवल एक ही छोर चलता था। ऐसे में सभी प्रतिद्वंद्वी टीमें इन दोनों को घेरने की रणनीति अपनाती थी।
 
शाहिद जैसे ही गेंद को आगे लेकर बढ़ते तो खासतौर पर गोरे अंपायर उन्हें 'ऑफ साइड' देकर उनके गोल नकारने में कसर नहीं छोड़ते। अब हॉकी में ऑफ साइड का नियम ही खत्म कर दिया गया है। शाहिद ने 1980 में चैपियंस ट्रॉफी से भारत के लिए अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज किया और 1990 में पेइचिंग एशियाई खेल उनका भारत के लिए आखिरी टूर्नामेंट था।

उन्होंने भारत के लिए 167 मैच खेले और 66 गोल किए। 1990 के पेइचिंग एशियाई खेल उनका भारत के लिए आखिरी टूर्नामेंट था। उन्होंने भारत के लिए 167 अंतरराष्ट्रीय मैच खेले और 66 गोल किए। यदि ऑफ साइड का नियम शाहिद के समय खत्म हो गया होता तो उन्होंने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में कम से कम पांच सौ गोल किए होते।

वह लगातार तीन  (1980, 1984 और 1988) ओलंपिक में खेले। वह 1980 में मास्को में उनके ही भारत की स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम के अहम सदस्य थे। 1984 में भारत की टीम गलत अंपायरिंग फैसलों के कारण पांचवें स्थान पर रही थी। 1988 में सोल ओलंपिक में छठे स्थान पर रहने वाली तत्कालीन भारतीय टीम के कोच एमपी गणेश से उनकी नहीं बनी। शाहिद गेंद को लेकर ड्रिबल करके गोल करने में यकीन करते थे। गणेश चाहते थे वह गेंद को तुरंत पास दें। शाहिद ने इसके बावजूद उन्होंने गणेश को इज्जत दी। दद्दा ध्यानचंद, इनाम उर रहमान, दद्दा के मंझले बेटे अशोक कुमार सिंह और फिर मोहम्मद शाहिद।

ये सभी भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के हॉकी के बेहतरीन ड्रिब्लर और अपने डॉज से दुनिया की मजबूत से मजबूत रक्षापंक्ति को भेदते रहे । इसी परंपरा की आखिरी कड़ी हैं धनराज थपिल्लै। इन सभी में ध्यानचंद को छोड़ कर सभी यह आरोप लगा कि वे गैलरी के लिए ज्यादा खेलते हैं। इस सभी ने अपनी इसी कलाकारी से दुनिया भर को अपना मुरीद बनाया और अपनी कलाकारी नहीं छोड़ी। भारत में हॉकी में बहुत कलाकार हुए हैं लेकिन ध्यानचंद के बाद शाहिद का सा दूसरा कलाकार शायद नहीं होगा। आखिर बस, शाहिद भाई बहुत याद आओगे।
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