भारत की फीफा अंडर -17 विश्व कप में शिरकत करने वाली टीम के कप्तान मिडफील्डर अमरजीत सिंह कियाम, सुरेश सिंह, गोलरक्षक धीरज सिंह और डिफेंडर बोरिस सिंह सहित आठ खिलाड़ी मणिपुर से हैं।
भारत के इन सभी नौजवान फुटबॉलरों के माता-पिता की हसरत अपने सपूतों को फुटबॉल में दुनिया सबसे बड़े मंच पर खुद दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में मौजूद रह दुनिया की अमेरिका, कोलंबिया और घाना सरीखी धुरंधर टीमों के खिलाफ खेलने की है। खुद ये नौजवान फुटबॉलर भी चाहते हैं कि वे जब दिल्ली में भारत के लिए फीफा अंडर-17 विश्व कप में पहले अमेरिका के खिलाफ, फिर कोलंबिया और घाना के खिलाफ ग्रुप ए में खेलने उतरे तो उनके मां-पिता भी उन्हें दुनिया की धुरंधर टीमों के खिलाफ खेलने के लिए यहां जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में मौजूद रहे।
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अफसोस यह है कि अमरजीत और बोरिस सरीखे इन सभी भारतीय फुटबॉलरों के माता-पिता के पास अपने सपूतों के मैच देखने के लिए विमान से इम्फाल (मणिपुर) से दिल्ली आकर वापस लौटने के हवाई टिकट तक के पैसे नहीं है। दरअसल दिल्ली और इम्फाल (मणिपुर) के बीच सड़क मार्ग से दूरी दो हजार किलोमीटर से कुछ ही ज्यादा है। सड़क मार्ग दुरुह है और रेल मार्ग है नहीं।
इस पर बड़ी परेशानी यह है कि दिल्ली से इम्फाल तक भी एक भी सीधी फ्लाइट नहीं है। इसके लिए पहले दिल्ली से कोलकाता और फिर वहां से इम्फाल के लिए फ्लाइट पकड़नी की जरूरत पड़ती है। दिल्ली और इम्फाल के बीच हवाई जहाज से आने जाने का एक टिकट 10 -12 हजार रुपये के करीब बैठता है।
माता -पिता के पास हवाई टिकट तक के पैसे नहीं
रैनेडी सिंह
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भारतीय फुटबॉल के आने वाले कल के इन नायकों के माता-पिता के इस दर्द से भारत के पूर्व अंतर्राष्ट्रीय बेहतरीन लेफ्ट मिडफील्डर रैनेडी सिंह वाकिफ हैं। रैनेडी सिंह खुद मणिपुर के हैं। मणिपुर में भारत की अंडर-17 फुटबॉल टीम के कप्तान अमरजीत सिंह कियम की मां आशंगबी देवी और पिता चंद्रमणि सिंह के साथ बोरिस सिंह, धीरज सिंह और और सुरेश सिंह के मां-पिता से मिल चुके हैं।
रैनेडी ने 'अमर उजाला' को शुक्रवार को इम्फाल से फोन पर बताया, 'मैंने इन सबकी व्यथा की बाबत खुद फुटबॉलर रह चुके मणिपुर के मुख्यमंत्री बीरेन सिंह से बात की है। मैंने उनसे कहा वे भारत की नुमाइंदगी कर मणिपुर का नाम रोशन करने जा रहे इन फुटबॉलरों के माता-पिता के लिए दिल्ली में मैच देखने के लिए हवाई टिकट की व्यवस्था कर दें तो इन फुटबॉलरों का हौसला बढ़ेगा। मैं एक लेख लिखने के सिलसिले में जब भारत की अंडर-17 टीम के मणिपुर के आठों फुटबॉलरों में से ज्यादातर के माता-पिता से मिला तो उन्होंने अपनी यह व्यथा कथा बताई।'
गुरबत और अभाव से जूझ कर मणिपुर के फुटबॉलरों ने बनाया मुकाम
भारत की अंडर-17 टीम के खासतौर पर मणिपुर से आने वाले इन फुटबॉलरों मे से किसी के पिता छोटी जोत के किसान हैं तो किसी की मां परिवार को चलाने के लिए मछली बेचती हैं। मणिपुर के इन सभी फुटबॉलरों ने गुरबत और अभाव से जूझ भारत की फीफा अंडर-17 विश्व कप फुटबॉल टूर्नामेंट के लि ए टीम में जगह बनाई है।
भारत की अंडर-17 टीम के सभी फुटबॉलरों के लिए फुटबॉल के सबसे मंच पर मुल्क की नुमाइंदगी करना वाकई इतिहास का हिस्सा बनना होगा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है गुरबत से जूझकर कर अपना पेट काट कर अपने बेटों के फुटबॉल खेलने को परवान चढ़ाने वाले उनके माता-पिता की अपने सपूतों को दिल्ली में स्टेडियम में साक्षात खेलते क्या हसरत पूरी हो पाएगी? भारत के भविष्य के इन हीरो के माता-पिता के लिए खुद इतनी बड़ी राशि की जुगत करना खासा मुश्किल है।
तो क्या एआईएफएफ आएगी आगे?
एआईएफएफ
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देश में फीफा अंडर -17 विश्व कप फुटबॉल की मेजबानी पर अखिल भारतीय फुटबॉल संघ (एआईएफएफ) करोड़ों रुपये खर्च कर चुकी है। एआईएफएफ को न केवल मणिपुर बल्कि भारत की फीफा अंडर-17 विश्व कप में शिरकत करने वाली टीम के सभी 21 खिलाड़ियों के माता-पिता को दिल्ली मे मेजबान टीम के ग्रुप ए के एक या दो मैच देखने या जितना मुमकिन हो सके उतने मैचों को देखने के लिए दिल्ली से उनके घर आने जाने वाले मैचों को देखने के लिए हवाई टिकट की व्यवस्था करने की पहल करनी चाहिए। बड़ा सवाल यह है कि क्या आईएएफएफ अपने नौजवान फुटबॉलरों के माता-पिता की इस हसरत को पूरा करने के लिए आगे आएगी।