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बैडमिंटन में गोल्ड मेडल की आस बनी सिंधू के करियर की 5 खास बातें

Thu, 18 Aug 2016 10:33 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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पीवी सिंधू - फोटो : getty
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दुनिया की नंबर दो और लंदन ओलंपिक की रजत पदक विजेता चीनी खिलाड़ी वैंग यिहान को सीधे सेटों में हराने के बाद जापानी खिलाड़ी नोजोमी ओकूहारा को भी आसानी से हराकर फाइनल में पहुंचने वाली पीवी सिंधू ने बैडमिंटन के महिला एकल स्पर्धा से देश के लिए स्वर्ण पदक की आस जगा दी है। वह साइना नेहवाल के बाद देश की दूसरी बैडमिंटन महिला खिलाड़ी हैं जो इस खेल से देश के लिए पदक जीतेंगी। 
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बैडमिंटन कोर्ट पर सिंधु का उदय ऐसे समय में हुआ, जब उन्हीं के शहर हैदराबाद से साइना नेहवाल लगातार सफलता हासिल करते हुए अपनी उपलब्धियों से सबका मन मोह रही थीं। लेकिन सिंधु ने इसे चुनौती मानते हुए अपने कदम आगे बढ़ाए और अपनी अलग जगह बनाने में कामयाब रहीं। 

21 साल की सिंधु हैदराबाद के गोपीचंद बैडमिंटन एकेडेमी में ट्रेनिंग लेती हैं। 5 जुलाई 1995 को जन्मी सिंधु ने अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 2014 में हासिल की थी, जब वे नौंवें पायदान तक पहुंचने में सफल रही थीं। जानते हैं सिंधू के करियर की 5 खास बातें।
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ये रही सिंधू की 5 खास बातें

पीवी सिंधू - फोटो : getty
पहला, पीवी सिंधू एकल बैडमिंटन रैंकिंग में 10वें पायदान पर हैं। सिंधु के माता-पिता दोनों ही पेशेवर वॉलीबॉल खिलाड़ी रहे हैं। उनके पिता रामन्ना भी अर्जुन पुरस्कार जीत चुके हैं। लेकिन उन्होंने वॉलीबॉल के बजाए बैडमिंटन को चुना। उनके आदर्श हैं पुलेला गोपीचंद, जो 2001 में ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियन बने थे।

दूसरा, सिंधु ने आठ साल की उम्र में बैडमिंटन खेलना शुरू किया था। सिंधु ने महबूब अली से बैंडमिटन की बुनियादी जानकारी ली। बाद में सिंधु पुलेला गोपीचंद की बैडमिंटन एकेडेमी पहुँचीं।

तीसरा, 2010 में वह महिलाओं का टूर्नामेंट उबेर कप में भारतीय टीम का हिस्सा रही थीं। 2014 में ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों में सिंधु सेमीफाइनल तक पहुंचने में कामयाब रही थीं। जबकि 2015 में वे डेनमार्क ओपन के फाइनल तक पहुंचीं। इसी साल उन्होंने मलेशिया मास्टर्स ग्रां प्री में एलक खिताब भी जीता है।

चौथा, 10 अगस्त 2013 को सिंधु भारत की पहली एकल खिलाड़ी बनीं, जिन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में कोई पदक (कांस्य) जीता।

पांचवां, वर्ष 2015 में सिंधु को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनके बारे में ये भी कहा जाता है कि वह जो भी ठान लेती हैं, वो पूरा करके मानती हैं। उनके आदर्श गोपीचंद ने भी कई बार कहा है कि सिंधु कभी हार नहीं मानतीं।
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