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एक उभरते सितारें की दास्तां: 'न दस लीटर दूध, न दर्जन भर अंडे'

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भारतीय पहलवान अमित कुमार ने हंगरी के बुडापेस्ट में चल रही वर्ल्ड कुश्ती चैंपियनशिप में रजत पदक जीता है।
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कुश्ती का जाना-माना नाम बन चुके सुशील कुमार के बाद अब अमित कुमार इस खेल को नए आयाम दे रहे हैं।

अमित को बहुत अफसोस है कि वे गोल्ड जीतते जीतते रह गए। लेकिन रजत पदक पाकर भी वे संतुष्ट हैं। उनकी यह पहली विश्व चैंपियनशिप है।

हंगरी में चैंपियनशिप के मुकाबले के दौरान साथी खिलाड़ियों के स्नेह के कारण उन्हें घर की कमी खास महसूस नहीं हुई।

अगला चैंपियन
अमित जब हंगरी चैंपियनशिप के लिए जा रहे थे, तभी ओलंपिक के रजत पदक विजेता सुशील कुमार ने कहा था, "मुझे अमित में अगला चैंपियन दिखता है।"

अमित ने उनके विश्वास को रखने की पूरी कोशिश की। उन्होंने जोर-शोर से अपनी ट्रेनिंग और अभ्यास शुरू किया।

वे बताते हैं, "मैंने कुश्ती प्रतियोगिता में हिस्सा लेने से पहले खास रणनीति बनाई थी। अभी नियमों में बदलाव आया है। मैंने उसी हिसाब से अटैक बाउट के मूवमेंट भी बदले।

अमित ने दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में प्रशिक्षण लिया।

पदक जीतने के पहले हंगरी में अपनी दिनचर्या के बारे में वे बताते हैं कि वे सुबह चार बजे से आठ बजे तक अभ्यास करते थे। पूरे हफ्ते अलग-अलग दिन ट्रेनिंग होती थी।
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मनोरंजन का भी वक्त नहीं मिलता था। बस खिलाड़ियों से हंस-बोल लेते थे।

सलमान खान की बॉडी या सनी की
कसरती बदन की बात आते ही संजय दत्त, सलमान खान और सनी देओल की चर्चा छिड़ जाती है। अमित का शरीर भी गठीला है। उन्हें इसकी प्रेरणा कहां से मिली।

अमित कहते हैं, "ये शरीर मुझे कुश्ती के अभ्यास से मिला है। मैं जिम नहीं जाता।"

वे खाने में तली हुई चीजों से परहेज करते हैं।

अमित अभी हंगरी में हैं। वहां भारतीय खाना नहीं मिलता। वे बस फल-फूल और ब्रेड खाकर काम चला रहे हैं।
न दस किलो दूध, न एक दर्जन अंडे

आम राय बन रही है कि सुशील और योगेंद्र के बाद अगर भारत किसी पर दांव लगा सकता है तो वह अमित हैं। इस तरह की अपेक्षाओं से कई बार खिलाड़ी दबाव में आ जाते हैं। मगर अमित दबाव महसूस नहीं करते, बल्कि यह बात उन्हें प्रेरणा देती है।

वे कहते हैं, "मैं अपने आप को खुशनसीब महसूस करता हूं कि इनके साथ मेरा नाम लिया जा रहा है।"

किसी पहलवान के बारे में अक्सर ये सोचा जाता है कि वह रोज दस किलो दूध या 12 अंडे खाता है। मगर अमित इन सबसे हटकर हैं।

अमित कहते हैं, "मैं न तो दस किलो दूध पीता हूं, न 12 अंडे खाता हूं। हमें तो वजन घटाने पर ध्यान देना पड़ता है। हम खिलाड़ी रोज ज्यादा से ज्यादा एक या आधा किलो दूध पीते हैं।"

गुंडों का खेल नहीं

अमित कुमार ने कुश्ती की शुरुआत गांव के अखाड़े में की। वहीं वे बच्चों के साथ कुश्ती करने जाते थे।

उन्होंने यह भी बताया, "मेरे घर वालों ने कभी नहीं कहा कि ये क्या धूल-मिट्टी के खेल में लगे हो। बल्कि उन्होंने जब देखा कि मैं इस खेल में रुचि ले रहा हूं तो मेरी मदद की।"
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अमित ने बताया कि भविष्य में उनका लक्ष्य है राष्ट्रमंडल खेल, एशियन गेम्स और 2016 का ओलंपिक गेम्स में पदक जीतना।

भारत में सुशील कुमार के पदक जीतने के बाद लोगों का कुश्ती के प्रति नजरिया बदलने लगा है।

वे बताते हैं, "कुश्ती बहुत आगे जाने वाली है। पहले लोगों की सोच थी कि गुंडे ही पहलवान होते हैं। अब सभी पहलवानों को सम्मान की नजर से दिखते हैं।"
ओलंपिक के लिए दीवानगी

आमतौर पर हर खिलाड़ी ओलंपिक में पदक जीतने का सपना देखता है, चाहे उसका रंग, गोल्ड, सिल्वर, या ब्रॉन्ज हो। मगर सवाल है कि हर खिलाड़ी ओलंपिक खेलों में पदक जीतने का सपना क्यों देखता है।

जवाब में अमित कहते हैं, "ओलंपिक खेलों का महाकुंभ है। उससे बड़ा कोई भी कुंभ नहीं। सभी इस महाकुंभ में अपना नाम चाहते हैं।"

अमित कुश्ती को ताकत के साथ साथ दिमाग का भी खेल मानते हैं। वे उभरते हुए पहलवानों को संदेश देना चाहते हैं कि लक्ष्य हमेशा बड़ा रखें।
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