अपनी 75वीं सालगिरह से स्वर्णिम शताब्दी की ओर बढ़ रहा ‘अमर उजाला’ आज लखनऊ में ‘संवाद : उत्तर प्रदेश’ का आयोजन कर रहा है। इस मौके पर देश के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियां आयोजन में शिरकत कर रही हैं। खेल जगत से भी इस आयोजन में कई सितारों का जमावड़ा लगा। भारत को ओलंपिक में बैडमिंटन में पहली बार पदक दिलाने वालीं साइना नेहवाल, उड़न परी और भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी उषा भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनीं। इस दौरान उनसे खेल से जुड़ी कई दिलचस्प घटनाओं पर चर्चा हुई।
सवाल: 1986 में आपको दौड़ने समय कैसा लग रहा था?
पीटी उषा: उस समय जो उपलब्धि हासिल हुई थी वह शानदार थी। मेरे लिए गर्व का समय था। मैं हमेशा ठीक से दौड़ती थी। मेरे कोच हमेशा मुझे मदद करते थे। मैं जब दौड़ने के लिए जाती थी तो सिर्फ जीत के बारे में सोचती थी।
सवाल: आप बैडमिंटन नहीं खेलना चाहती थीं और वह शौक के रूप में सामने आया। इस बारे में कुछ कहेंगी?
साइना नेहवाल: मैं आज जो भी हूं वह माता-पिता के कारण हूं। मुझे बैडमिंटन कभी पसंद नहीं था। मैं कुछ भी खा लेती थी, लेकिन बैडमिंटन नहीं खेलती थी। जब पापा का प्रमोशन हुआ तो हैदराबाद जाना हुआ। वहां मैंने कराटे सीखना शुरू किया। मैं अपनी पूरी ताकत उसमें लगा देती थी। मुझे बाद में लगा कि यह काफी मुश्किल है। फिर मैंने पापा से कहा कि मुझे किसी दूसरे खेल में डाल दो। उन्होंने फिर मुझे बैडमिंटन खेलने की सलाह दी। उस समय मुझे लड़कों से भिड़ना पसंद था। उन्हें हराना पसंद था। उस समय बैडमिंटन में भारत का प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहता था। चीन और कोरिया का वर्चस्व था। मेरी मां को स्टेफी ग्राफ पसंद थीं और वह उनके मैच को देखती थी। मां ने ही कहा था कि तुम्हें ओलंपिक पदक जीतना है। मेरी दादी चाहती थी कि लड़का पैदा हो। इस कारण मम्मी चाहती थी कि मैं चैंपियन बनूं। मेरे लिए कोई ऐसा आदर्श नहीं था। उस समय मेरी मम्मी ने आगे बढ़ाया। मेरी मां का नाम उषा है। वह मेरे लिए पीटी उषा हैं। वह मुझे कहती थीं कि तुम किसी को हरा सकती हो। मां की वजह से ही बैडमिंटन में अपना नाम बनाया। इसी से मैंने साइना बनाम चाइना (चीन) बनाया। मेरी तुलना धोनी से होने लगी थी।
सवाल: दबाव से कितना फर्क पड़ता है एथलीट पर?
- पीटी उषा: आज तो सबकुछ है। कोच भी है और ट्रैक भी है। मेरे समय में कुछ नहीं था। रेलवे ट्रैक के किनारे दौड़ती थी।
- साइना नेहवाल: मैंने किताब में मिल्खा सिंह और पीटी उषा के बारे में पढ़ा है। मैं पढ़ती थी कि पदक से दोनों चूक गए। जब मैंने खुद खेलना शुरू किया तो सब कुछ समझ आया। बोलना आसान है कि पदक नहीं मिला, लेकिन उसका दुख सिर्फ खिलाड़ी जानता है।
सवाल: 2012 में आपने कांस्य जीता था। क्या आप भी दबाव में थीं?
साइना नेहवाल: अगर आप दबाव को नहीं झेल पाते हैं तो आप खिलाड़ी नहीं हैं। आप हमेशा यह सोचते हैं कि आपका विपक्षी कौन है। आपको किसे हराना है। कौन खिलाड़ी लगातार आपको हरा रहा है। आपको प्रैक्टिस के दौरान भी दबाव झेलना पड़ता है। आपको प्रैक्टिस के समय भी यह सोचना पड़ता है कि कैसे तैयारी करनी है। आपने जितनी अच्छी ट्रेनिंग की है उतना ही अच्छा परिणाम आएगा। आप अगर मुख्य मैच में दबाव में आ जाते हैं तो उससे अच्छा है कि खेल को छोड़कर पढ़ाई कर लें। आप जोकोविच या रोजर फेडरर को देखिए। उन्हें सब फॉलो करते हैं। आप अगर बहुत तैयारी के बाद मैच में अच्छा नहीं खेलते हैं तो मुश्किल होगी।आपके दिमाग में यह होना चाहिए कि दबाव में नहीं आना चाहिए। आपको अपने माता-पिता के बारे में सोचना चाहिए। जब आप परीक्षा में बैठते हैं उसी तरह का दबाव मैच की शुरुआत में रहता है। जोकोविच भी ऐसा ही कहते हैं कि शुरुआती समय में काफी दबाव होता है, लेकिन आपको विपक्षी और नतीजों पर ध्यान देना चाहिए। इससे मुझे हमेशा ओलंपिक या कई टूर्नामेंट में मदद मिली। विश्व की नंबर-1 खिलाड़ी बनना आसान नहीं है। मुझे हमेशा विश्वास रहा है कि मैंने अच्छी ट्रेनिंग की है और फिटनेस पर ध्यान दिया है तो नतीजे आएंगे।
सवाल: खाने में आपको क्या पसंद है?
साइना नेहवाल: मुझे आइसक्रीम, चाट, आलू पराठा काफी पसंद है, लेकिन खिलाड़ियों को इससे दूर रहना पड़ता है। आपको पदक जीतने के लिए इनसे दूर रहना पड़ता है। जब पदक जीतते हैं तो यह सब चीजें नहीं खा पाने का दुख दूर हो जाता है।
सवाल: 2024 ओलंपिक के लिए भारत कितना तैयार है? 2036 ओलंपिक की मेजबानी के लिए क्या कहेंगी?
पीटी उषा: इस बार हमने काफी अच्छी तैयारी की है। हमने वहां इंडिया हाउस तैयार किया है। स्लिप थेरेपी और मेंटल थेरेपी पर ध्यान दिया है। भारतीय ओलंपिक संघ की नजर सिर्फ परेड पर नहीं है, पदक जीतने भी पर है। 2036 ओलंपिक की मेजबानी हमारे प्रधानमंत्री का सपना है। हम उसकी तैयारी में आगे बढ़ रहे हैं।
सवाल: अगर आप बैडमिंटन चैंपियन नहीं होती तो क्या होतीं?
साइना नेहवाल: मैं जो कुछ भी होती सिर्फ खेल के क्षेत्र में होती। उस समय तो हजार चीजें दिमाग में थी। उस समय जो माता-पिता सिखाते हैं बच्चा उसी में आगे बढ़ता है। मेरे दिमाग में कुछ समय बाद ऐसा ही हुआ था और मैं बैडमिंटन में आगे बढ़ गई थी। मेरे फेवरेट खिलाड़ी रोजर फेडरर और मारिया शारापोवा हैं।
सवाल: बहुत सारी लड़कियां स्पोर्ट्स में जाना चाहती है। आज की पीढ़ी जल्दी हार भी मान जाती है। उनके लिए क्या कहेंगी?
साइना नेहवाल: आज का समय पहले से ज्यादा आसान हो गया है। सबकुछ उपलब्ध है। कोच हैं, एकेडमी हैं और सुविधाएं हैं। खेल बहुत शारीरिक क्षमता मांगता है। इसके लिए सबको तैयार रहना होगा। आज लड़के और लड़कियां काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। आपको बेस्ट रैकेट और बेस्ट जूते लेने से कुछ नहीं होगा। आपको हफ्ते के छह दिन 12 घंटे प्रैक्टिस करनी होगी। इसके लिए तैयार रहना होगा। इन चुनौतियों को दिमाग में डालना होगा। बस एक ही चुनौती है कि आप शरीर को तोड़ने के लिए तैयार हैं या नहीं। यही है चैंपियन बनने का मॉडल पेपर।
आइए जानते हैं पीटी उषा और साइना नेहवाल के बारे में...
16 साल की उम्र में पहली बार ओलंपिक का हिस्सा बनीं पीटी उषा
पीटी उषा
- फोटो : सोशल मीडिया
1980 में केवल 16 साल की उम्र में पीटी उषा ने मॉस्को में हुए ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में हिस्सा लिया था। चार साल बाद 1984 में वो किसी ओलंपिक खेल के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट बन गई थीं। लेकिन, बस एक मामूली से फासले से उषा ओलंपिक का मेडल जीतने से चूक गई थीं। उन्होंने 1984 ओलंपिक खेलों में चौथा स्थान हासिल किया था।
ओलंपिक के बाद पीटी उषा के प्रदर्शन में गिरावट आई और लोगों ने उनकी आलोचना शुरू कर दी। हालांकि, उषा को खुद पर यकीन था। 1986 के सिओल एशियाई खेलों में उन्होंने चार गोल्ड मेडल जीते थे। 400 मीटर की बाधा दौड़, 400 मीटर की रेस, 200 मीटर और 4 गुणा 400 की रेस में उषा ने स्वर्ण पदक जीते। 100 मीटर की रेस में वो दूसरे नंबर पर रहीं। 1983 में उन्हें अर्जुन अवॉर्ड दिया गया था। 1985 में उन्हें देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उषा ने 1997 में अपने खेलों के करियर को अलविदा कहा। उन्होंने भारत के लिए 103 अंतरराष्ट्रीय मेडल जीते हैं।
ओलंपिक में पदक जीतने वाली पहली शटलर हैं साइना नेहवाल
साइना नेहवाल
- फोटो : सोशल मीडिया
साइना नेहवाल ओलंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी हैं। उन्होंने 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था। इस स्टार शटलर ने अपने करियर की शुरुआत बहुत पहले ही कर दी थी। उन्होंने 2008 में BWF वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप जीती थी। उसी साल उन्होंने पहली बार ओलंपिक के लिए क्वालिफाई भी किया था, लेकिन लंदन 2012 में उन्होंने अपने शानदार प्रदर्शन से दुनिया भर में प्रसिद्धि हासिल की। उनके पति पी कश्यप भी बैडमिंटन खिलाड़ी रह चुके हैं।
2008 में बीजिंग में आयोजित हुए ओलंपिक खेलों मे भी वह क्वार्टर फाइनल तक पहुंची थीं। साइना भारत सरकार द्वारा पद्म श्री और खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं। इस पूर्व नंबर एक बैडमिंटन खिलाड़ी ने अपने करियर में कई मेडल जीते। वह विश्व चैंपियनशिप में एक रजत और एक कांस्य, राष्ट्रमंडल खेलों में तीन स्वर्ण, एक रजत और एक कांस्य और एशियाई खेलों में दो कांस्य जीत चुकी हैं।