हस्तरेखा देख कर भविष्य जानने की विधा धीरे धीरे कम यानी अलोकप्रिय होती जा रही है लेकिन विद्वानों का ध्यान इस दिशा में गहराया है। हस्तरेखा अध्ययन या हस्तरेखा शास्त्र का प्रयोग कई सांस्कृतिक विविधताओं के साथ दुनिया भर में देखा जाता है। हांलाकि इसे छद्म विज्ञान माना जाता है। लेकिन यह एक पुरानी विधा है और इस का उपयोग अब अपराध विज्ञान के क्षेत्र में भी किया जाना लगा है।
हस्तरेखा शास्त्र की जड़ें चीनी वाईजिंग (आई चिंग), भारत में ज्योतिष शास्त्र और रोम में (जिप्सी) भविष्यवेत्ताओं से जुड़ी मानी जाती है। यह भी मान्यता है कि ऋषि वाल्मीकि ने एक पुस्तक लिखी थी और जिसका अंग्रेजी अनुवाद “द टीचिंग्स ऑफ वाल्मीकि महर्षि ऑन मेल पामिस्ट्री” के नाम से मशहूर है।
आधुनिक हस्तरेखा शास्त्री अक्सर भविष्य बताने वाली पारंपरिक तकनीक को मनोविज्ञान, संपूर्ण निदान, अनुमान के वैकल्पिक तरीकों से भी जोड़ते रहे हैं। हस्तरेखा शास्त्र में हाथ व्यक्ति की हथेली को “पढ़कर” उसके चरित्र या भविष्य के जीवन का मूल्यांकन किया जाता है। विभिन्न रेखाओं जैसे दिल की रेखा, जीवन रेखा, भाग्य रेखा सहित अन्य रेखा और उठान को देखकर हस्तरेखा विज्ञान के जानकर उनसे संबद्ध आकार, गुण और अंतरशाखाओं के संबंध में सुझाव दिते हैं।
मनस्विद एन्क्रॉय फ्रीडमेन के अनुसार व्यक्ति के ‘प्रमुख हाथ’ (जिससे वह या जिसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है) सचेत मन का प्रतिनिधित्व करता है और दूसरा हाथ अवचेतन का संकेत करता है। हस्तरेखा विज्ञान की कुछ परंपराओं में दूसरे हाथ से वंशानुगत या परिवार के लक्षणों का अनुमान लगाया जाता है। जिससे अतीत या अध्यात्मिक शब्दों में पूर्व जन्म की जानकारी भी मिलती है।
बहस होती रही है कि कौन सा हाथ पढ़ना बेहतर है, पर दोनों का अपना महत्व है। कहते है कि बायां हाथ व्यक्ति की संभावनाओं को दिखाता है, और दाहिना सही व्यक्तित्व का प्रदर्शक होता है। बायां हाथ बताता है कि हम क्या-क्या लेकर पैदा हुए हैं और दाहिना दिखाता है कि हमने इसे क्या बनाया है। बायां हाथ बताता है कि ईश्वर ने आपको क्या दिया है और दायां बताता है कि आपको इस संबंध में क्या करना है।