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मक्खी मच्छर भी इंसान से ज्यादा होशियार

Fri, 03 May 2013 11:17 AM IST
ज्योतिर्मय
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बुद्धि के अलावा मनुष्य में ऐसी और कौन सी विशेषता है कि उसे अन्य जीवों की तुलना में इक्कीस कहा जा सके। सही बात तो यह है कि छोटे-छोटे कीड़े मकोड़ों में भी ऐसी कई विशेषताएं हैं जो मनुष्य को पिछड़ा हुआ सिद्ध करती हैं। उदाहरण के लिए मधुमक्खियों को ही लिया जाए। उनके एक बड़े छत्ते में लगभग 20 हजार मक्खियां रहती हैं।
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इतनी ज्यादा मक्खियों में सिर्फ एक मक्खी जिसे रानी मक्खी कहते हैं वही प्रजनन और परिवार की वृद्धि का काम करती है। जब रानी मक्खी बूढ़ी हो जाती है वह अण्डे देना बंद कर देती है। उसे अपना सिंहासन खाली करना पड़ता है। नई रानी के कार्य और अभिषेक का दायित्व भी बूढ़ी रानी ही निवाहती है।

जब तक वह अण्डे देती रहती है तब तक सूतिका गृह में ही रहती है। अण्डे देना बंद करने के बाद वह पहली बार सूतिका गृह छोड़कर बाहर आती है और देखती है किसे उत्तराधिकारी बनाया जाए। चुनाव लगभग दस दिन में पूरा करती है। किसी ठीक ठिकाने पर रहने और योजना पूर्वक अपनी बस्ती बसाने में मनुष्य या मधुमक्खी ही सक्षम नहीं हैं, टरमाइट्स जाति का एक कीड़ा आटेपाद जमीन के भीतर बहुत ही कुशलता के साथ घर बसा कर रहता है।
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यह कीड़ा जमीन के भीतर शहर बसा कर रहता है। वह चींटी और दीमक से भी बुद्धिमान है इस जाति के कीड़ों द्वारा आपस में जिस ढंग से श्रम का वर्गीकरण किया जाता है वह अपने आप में अद्वितीय और अनूठा है। ये कीड़े लाखों की संख्या में इकट्ठे रहते हैं और इतने सुनियोजित ढंग से कि क्या मजाल तनिक भी अव्यवस्था फैल जाए।

ये अपने समुदाय की रानी के आदेश निर्देशों का पालन करते हैं। कुछ कीड़े भोजन इकट्ठा करने का काम करते हैं, कुछ निर्माण में लगते हैं, और किन्हीं को प्रजनन कार्य सौंपा जाता है। चींटियों की एक जाति खेती का काम करती है और उसी से अपना गुजारा करती है।

यह पढ़ सुनकर शायद किसी को विश्वास न हो, किन्तु यह सच है इस जाति की चींटियां हरी पत्तियों को तोड़-तोड़कर अपने बिलों के पास दूर-दूर तक बिछा देती है इन पत्तियों पर फफूंदी लगती रहती है और ये चींटियां फफूंद खाकर अपना गुजारा करती हैं। यह तो कुछेक कीट पतंगे जैसे जीवों का हुआ। इस तरह के हजारों जीव जंतु हैं, जो अपनी जीवनशैली से मनुष्य को बिना कोई चुनौती दिए और दावा जताए परमात्मा से मिले विशिष्ट अनुदानों की घोषणा करते हैं।
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