मानव शरीर सबसे दुर्लभ होता है। इससे भी दुर्लभ है वास्तविक गुरू का मिलना। वेदों और शास्त्रों को जितना पढ़ोगे उतने ही उलझते जाओगे। लेकिन जब वास्तविक गुरू मिल जाता है कि तो वह उलझनों को दूर करके ज्ञान प्रदान करता है। इसलिए वास्तविक गुरू का मिलना दुर्लभ कहा गया है। नारद पुराण में कहा गया है कि मानव शरीर इतना दुर्लभ है कि स्वर्ग में रहने वाले देवता भी इसके लिए तरसते रहते हैं। हजारों जन्मों के बाद यह मानव देह मिलता है। गुरूड़ पुराण कहता है कि मनुष्य शरीर पाये बिना तत्व ज्ञान नहीं मिल सकता है।
शंकराचार्य ने कहा है कि मानव शरीर और वास्तविक गुरू के अलावा एक अन्य चीज और है जो दुर्लभ है वह है भूख। जब तक भूख नहीं होगी, किसी चीज को पाने की ललक नहीं होगी तब तक उसे प्राप्त नहीं कर सकते। अगर पेट भरा हो तो छप्पन भोग भी सामने हो तो उस ओर मन नहीं जाता है। इसी प्रकार अगर ईश्वर को पाने की इच्छा गहरी नहीं हो तो प्रवचन सुनते रहेंगे, समझकर भी नासमझ बने रहेंगे। भूख ऐसी होनी चाहिए जैसे दो-तीन दिन से कुछ खाया नहीं वैसी भूख। अनंत संत मिले और हमने सुना पर हम समझे नहीं क्योंकि हमने लेकिन, लगाया। हमने कहा कि अभी तो हम गृहस्थ हैं। करेंगे, अभी हमारी उम्र ही क्या है। अभी तो खेलने कूदने के दिन हैं, करेंगे! यही करते करते बुढ़ापा आ जाता है और हम जहां थे वहीं रह जाते हैं।
मनुष्य शरीर में एक शक्ति है धारण करने की जो अन्य जीवों में नहीं है। गरूड़ जी ने काक भुसुण्डी से प्रश्न किया कि सबसे दुर्लभ कौन शरीर है। इसके जवाब में काक ने कहा कि सबसे दुर्लभ मानव शरीर है क्योंकि इसी देह से नर्क, स्वर्ग, भक्ति और ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मानव शरीर में ही ज्ञान धारण करने की शक्ति है। मानव शरीर इन्द्रियों से बना है इसलिए माया कि ओर स्वभाविक जाता है। नदी की धारा की ओर जैसे वस्तु स्वभाविक बहती है उसी तरह हमारा मन भी प्रवाहित होता है। भगवान की ओर जाना इन्द्रियों के विरूद्घ दिशा में जाना है इसलिए कठिनाई महसूस होती है। इस कठिनाई को ज्ञान के द्वारा दूर किया जा सकता है। सुख पाने के लिए इसी मानव शरीर में भूख पैदा करनी होगी।
साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)
कृपालु जी परिचय
कृपालु जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में
हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी
में व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु
में कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट
वनों में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में
विद्वानों की एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।