फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हमारा हर कर्म आनंद प्राप्ति के लिए होता हैः कृपालु जी महाराज

Wed, 06 Feb 2013 12:17 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
विज्ञापन
विज्ञापन
'सुखाय दुःख मोक्षाय संकल्प इह कर्मिना' प्रत्येक कर्म करने वाले का उद्देश्य दो सकता है। एक सुख के लिए और दूसरा दुःख समाप्त करने के लिए तीसरा कोई लक्ष्य नहीं हो सकता है। हम प्रत्येक क्षण कुछ न कुछ कर रहे हैं इसका एक मात्र कारण है आनंद के लिए और दूसरा सुख के लिए। हम सभी दुःखी हैं, प्रत्येक क्षण दुःखी हैं। हम सभी हंसते हैं लेकिन हंसना ही सुख नहीं है।
विज्ञापन


गीता के तीसरे अध्याय का पांचवां श्लोक कहता है कि, कोई जीव एक क्षण भी अकर्मा नहीं रह सकता। हम भले ही कह लें कि, हम कर्म नहीं करेंगे, रजाई ओढ़ भी लें तब भी कर्म करेंगे। सपने में भी आप कर्म करेंगे। लेकिन हर कर्म का उद्देश्य एक है दुःख निवृति और आनंद प्राप्ति लेकिन वास्तव में तो एक लक्ष्य है आनंद प्राप्ति क्योंकि आनंद प्राप्ति हो जाएगी तो दुःख निवृति अपने आप हो जाएगी।

मन सुख और दुःख का भोक्ता है। मन जब निश्चल होता है तब दुःख की अनुभूति नहीं होती है लेकिन यह क्षणिक होता है। लेकिन दुःख से मुक्ति तभी मिल सकती है जब सुख मिल जाए। वास्तव में दुःख का कारण अज्ञान है। अज्ञान के दूर होते ही दुःख के बादल छंट जाते हैं।
विज्ञापन


वेदों में उल्लेख किया गया है कि मनुष्य शरीर ही एक मात्र अज्ञानता को दूर करने का माध्यम है। जो मनुष्य शरीर में ज्ञान अर्जित नहीं करता है वह 84 लाख योनियों में भटकता रहता है। केनोपनिषद् में कहा गया है कि मनुष्य शरीर में अगर अज्ञान को नहीं मिटाया तो कई कल्पों तक दुःख प्राप्त करते रहोगे। 

भागवद् में कहा गया है कि, मानव देह बड़ा दुर्लभ है। देवता लोग मानव शरीर को प्राप्त करने के लिए तरसते हैं। इसका कारण यह है कि मानव शरीर में ही कर्म करने का अधिकार है। तुलसीदास जी ने भागवद् के शब्द का अनुवाद करते हुए लिखा है कि वह आत्महत्यारा है जो मानव देह प्राप्त करके अज्ञान दूर नहीं करता है, जिससे आनंद मिल जाता है वह सुखी हो जाता है उसके दुःख दूर हो जाते हैं।
साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)

कृपालु जी परिचय
कृपालु जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें