लोग आशीर्वाद देते समय कहते हैं तुम्हारा भला हो और भला हो ही जाएगा, यह जरूरी नहीं है। अगर ऐसा होता तब तो दुनिया में कोई दुखी दरिद्र नहीं रहता। दरअसल आप जब भी कभी किसी के प्रति शुभकामना व्यक्त करते हैं, तो आपके भीतर जितनी प्राणऊर्जा है और जिसे आशीर्वाद दे रहे हैं, उसमें कितनी ग्रहणशीलता है उसी आधार पर दूसरे का भला होता है।
आशीर्वाद दे कर भक्तों का कष्ट दूर करने के दावों की असलियत जानने के लिए रामकृष्ण मिशन के संन्यासी स्वामी तेजोवलयानंद ने कुछ प्रकरणों का अध्ययन किया और पाया कि समस्याओं का हल कह देने भर से नहीं होता। उसके लिए आशीर्वाद देने वाले का तप तेज और लाभ उठाने वाले की इच्छाशक्ति भी जरूरी है।
स्वामीजी के अनुसार इच्छाशक्ति जगाने में जप, भजन और योगासन से मदद मिलती है। भजन आसन आदि से मदद मिलती है पर आशीर्वाद के प्रभाव को असरदार बनाता है मंत्रजप। जप के दौरान उपयोग किए गए मंत्र की ध्वनि पूरे शरीर में प्रभाव उत्पन्न करती है।
इसका पहला प्रभाव मस्तिष्क में शीतलता और स्थिरता लाता। इससे न केवल शारीरिक लाभ मिलता है, बल्कि अध्यात्मिक लाभ भी मिलता है। जप और उससे उत्पन्न हुई स्थिरता अपने से उच्च आध्यात्मिक स्थिति वाले व्यक्तियों, संतों और गुरुजनों की शुभाकांक्षा को ग्रहण करने लायक मनोभूमि बनाते हैं।
शरीर और चित्त के परिष्कार के लिए अपनाए गए योगासनों का लाभ उन्हें सही ढंग से करने पर ही मिलता है। आसन, भजन और ध्यान आदि से चित्त निर्मल हो जाता है तो यह स्थिति बनती है कि किसी का आशीर्वाद ग्रहण किया जा सके। याद रहे ‘चिरायु भव’ कहने मात्र से आशीर्वाद पूरा नहीं हो जाता।
आशीर्वाद से सुखपूर्वक जीने का संकल्प भी जाग रहा होता है। व्यक्ति के संकल्प को ऋषि या गुरु के आशीष पुष्ट करने से उसमें कार्य सिद्धि के प्रति आत्मविश्वास जागता है। कार्य को करने की प्रेरणा भी जगती है।