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छोटे से परिवार की बड़ी प्रेम कहानी

Mon, 20 Jan 2014 02:33 PM IST
अध्यात्मिक गुरू/ सुधांशु जी महाराज
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प्राचीन घरों में नैतिकता और त्याग की भावना दिखाई देती थी। लोग कहते थे कि इज्जत की रोटी कमाओ, इज्जत की रोटी खाओ। इज्जत ही तुम्हारी सबसे बड़ी कमाई है। परिवार छोटा ही सही मगर अच्छा हो। मकान बहुत बड़ा हो, साधन सुविधाएं अधिक हों, ऐसी बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया जाता था।
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बल्कि इस बात पर ध्यान था कि छोटे से मकान के अन्दर कितने प्यार से, आनन्द से तुम रह रहे हो, कितनी नेकनीयती से तुम जी रहे हो, धर्म कितना तुम्हारे साथ है?

इसका परिणाम था कि लोगों ने धर्म को और त्याग को अधिक महत्व दिया। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज हम अपनी संस्कृति के इन बुनियादी तत्वों से पीछे हटते जा रहे हैं। आज हम अपनी ही विरासत को भुलाए दे रहे हैं।
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इसलिए परिवार में सबकुछ है लेकिन त्याग भावना एवं धर्म का अभाव होने के कारण हम दुःखी हैं, पीडि़त हैं और अशांत हैं। एक मां ने अपने बच्चे को गरीबी में भी जीने का ढंग सिखाया, त्याग और कत्र्तव्य का पाठ पढ़ाया। समयानुसार बेटे की शादी हुई।

बहू घर में आई। बहू पति से घूमने की जिद करती थी। पति समझाता है कि मेरी मां ने मुझे बड़ी मुश्किलों से पाला है। जब छोटा था तो पिताजी गुजर गए। मेरी मां ने कपड़े सिल-सिल कर मुझे पढ़ाया।

बहुत मेहनत करके मेरी मां ने मुझे इस लायक बनाया है। तुम्हारी भी कोशिश होनी चाहिए कि तुम मां की अधिक-से-अधिक सेवा करो। मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं। तुम्हारा तन ढांप सकता हूं। पेट भर सकता हूं लेकिन अगर हम सैर करने के लिए जाएंगे तो कर्ज लेना पड़ेगा।

अगर कर्जे से ही गृहस्थी शुरू हुई तो सारा जीवन कर्ज में बीत जाएगा। पत्नी कहती है कि मैं मायके से पैसे ले आउंगी। पति कहता है कि मायके से पैसे मंगाओगी तो यह मेरे लिए लानत वाली बात होगी। इधर सास सुन रही थी। उसने रात-दिन कपड़े सिल-सिल कर बेटे को पढ़ाया, उसे लायक बनाया, उसकी शादी की, पर बहू बाहर घूमने की जिद कर रही है। उसने देखा कि मेरे बच्चे घूमने जाना चाहते हैं तो इसके लिए मुझे थोड़ा-सा त्याग करना पड़ेगा।

उसने इशारे से बेटे को पास बुलाया और धीरे से कहा, ‘बेटा, बहू जो कह रही है ठीक कह रही है। सारी जिंदगी तुम इसी पचड़े में पड़े रहोगे, इसी घेरे में घूमते रहोगे, घर की समस्याओं से बाहर नहीं निकल पाओगे। बाहर जाओगे तो एक-दूसरे को समझोगे।

बहू को भी समझने का मौका मिल जाएगा कि हमारे घर के तौर-तरीके क्या हैं, संस्कार क्या हैं, हमारी रिश्तेदारी कैसी हैं, कैसे रहते हैं? ऐसा करो तुम 5-10 दिन के लिए किसी हिल स्टेशन पर घूमने चले जाओ। बेटा कहता है, मां, जाना तो चाहता हूं लेकिन पैसे कहां हैं?

मां अपने हाथ से कंगन निकाल कर देती है बेटा! ये तेरे पिता की निशानी है। मैंने सोचा था किसी आड़े वक्त पर इन्हें

बेच दूंगी, पर भगवान ने कोई आड़ा वक्त नहीं आने दिया। जैसे-तैसे हमारी गृहस्थी चलती रही। दुःख में नहीं बिके, पर चलो खुशी के लिए ही बिक जाएं। अब मैं इनका क्या करूंगी? मेरे जाने के बाद ये कंगन तुम्हारे ही तो हैं। तुम्हारे ही तो काम आएंगे। तुम घूमने के लिए चले जाओ।

जब यह बात हो रही थी तो बहू भी खिड़की के पास कान लगाकर सुन रही थी कि मां-बेटे में क्या खुसुर-पुसुर हो रही है। हो सकता है मां मेरे बारे में इन्हें भड़का रही हो लेकिन जैसे ही उसने सुना कि मां तो इतना बड़ा त्याग करने के लिए तैयार है तो उसका हृदय रो पड़ता है।

सवेरे उठ कर पति के आगे हाथ जोड़कर उसने अपने पति से कहा, हमें कहीं घूमने-फिरने की, पिफजूल खर्ची करने की कोई जरूरत नहीं है। हमारा हिल स्टेशन यही हमारा घर है। जहां ऐसी मां हो, ऐसे पति हों, तो मेरे लिए यह छोटा-सा घर भी स्वर्ग का टुकड़ा है, मुझे और क्या चाहिए।

एक दिन ऐसा भी आता है कि सास के घुटनों में दर्द है तो बहू घुटने दबाती है और अपने पति से कहती है कि मां से चला नहीं जाता, भगवान का भजन करती रहती हैं। मुझे लगता है कि मां की तीर्थयात्रा करने की इच्छा है।

आप मां जी को तीर्थ करा लाओ। सारी जिंदगी हमारे लिए अपना शरीर घुलाती रहीं। अब हमारा भी तो फर्ज है कि हम कुछ करें। पति कहने लगे, मैं चाहता तो हूं लेकिन मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं मां को लेकर जा सकूं।

बहू ने वही कार्य किया, जो उसकी सास ने किया था। उसने भी अपने कंगन उतारे और अपने पति के हाथ में देते हुए बोली, यह सम्पत्ति कब काम आएगी। आपने कंगन पहनाए और हम इन कंगनों का प्रयोग करके अगर मां को तीर्थ करा देते हैं, तो इससे अच्छा पुण्य कमाने का अवसर हमें कहां मिलेगा?

इधर सास माता बाहर छोटे से पोते को खिला रही हैं? जब उसने उनकी बातें सुनीं तो डांटते हुए कहा, कि मैं कहीं पहाड़ पर जाकर भगवान के दर्शन क्यों करूं? अरे मेरे कृष्ण भगवान तो ये बालगोपाल हैं न। ऐसे साक्षात् भगवान के दर्शन और कहां होंगे?

जिस परिवार में ऐसा प्रेम और त्याग होता है वहां आनन्द, खुशी और प्रसन्नता का वास होता है। क्या हुआ अगर ऐसे परिवार के पास दौलत न हुई? असली दौलत तो प्यार की है। यह दौलत जिसके घर में है, वही दुनिया का सबसे बड़ा अमीर है।

आज हमने धन का जो अर्थ समझ लिया है, उसी का परिणाम है कि आज चारों ओर पाप और अशान्ति के दर्शन हो रहे हैं। अशान्ति और दुःख से पार पाना है तो प्रेम को अपनाओ, प्रार्थना को अपनाओ, अपनी आत्मा को जाग्रत करो, तुम्हारे जीवन की धरा बदल जाएगी। जीवन प्रसन्नता से, घर आनन्द से भर जाएगा।
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