एक फकीर था। वह भीख मांगकर अपनी गुजर-बसर किया करता था। भीख मांगते वह बूढ़ा हो गया। उसे आंखों से कम दिखने लगा। एक दिन भीख मांगते हुए वह एक जगह पहुंचा और उसने आवाज लगाई। किसी ने कहा, आगे बढ़ जाओ। यह ऐसे आदमी का घर नहीं है, जो तुम्हें कुछ दे सके।
फकीर ने पूछा, भैय्या आखिर इस घर का मालिक कौन है। जो किसी को कुछ नहीं देता। उस आदमी ने कहा, अरे पागल , तू इतना भी नहीं जानता कि यह मस्जिद है। इस घर का मालिक खुद अल्लाह है। फकीर के भीतर से तभी कोई बोल पड़ा। यह लो। आखिरी दरवाजा आ गया।
इससे आगे अब कोई और दरवाजा नहीं है। अपने अंदर की आवाज सुनकर फकीर ने कहा, अब मैं यहां से खाली हाथ नहीं लौटूंगा। जो यहां से खाली हाथ लौट गए, उनके भरे हाथों की भी क्या कीमत है।
फकीर वहीं रुक गया और फिर कभी कहीं गया नहीं। लोग समय-समय पर उसे खाना पीना देते रहे। कुछ समय बाद जब उस बूढ़े फकीर का अंतिम क्षण आया तो लोगों ने देखा वह उस समय भी मस्ती से नाच रहा था।