सौंदर्य की कई अभिव्यक्ति है। कृतज्ञता सौंदर्य की एक ऐसी अभिव्यक्ति है। जब आपको अभाव का अनुभव न हो, तब आप कृतज्ञता में होते हैं। आप कृतज्ञता के साथ अभाव को अनुभव नही कर सकते। ये दोनो एक ही समय एक साथ नही हो सकते। शायद, आपने दोनो को एक साथ अनुभव किया हो, लेकिन एक ही समय में नही। जब आप कृतज्ञता अनुभव करते हो तो आप पूर्ण होते हो।
जब आप अभाव अनुभव करते हो, असंतोष का उद्भव होने लगता है। जब आप असंतोष करते हैं तो नकारात्मकता बढ़ने लगती है। जिनके पास यह ज्ञान नही है, वे इस असंतुष्टि से बाहर नही निकल सकते, वे जीवन भर असंतुष्ट रहते हैं। वे आज किसी का अभाव अनुभव करते हैं तो दूसरे दिन किसी और वस्तु का अभाव अनुभव करते हैं। इसका कोई अंत नही है।
ये आपकी प्रकृति बन जाती है। और इसी से इच्छाओं का जन्म होता है और जब इच्छाओं का जन्म होता है तो मस्तिष्क स्पष्ट तरह से नही सोच सकता केन्द्रीत नही हो सकता, सही तरह से काम नही कर सकता; और आप स्वाभाविक रुप से सब कुछ खोने लगते हैं।
इसीलिए ज़ीज़स ने कहा, ‘‘जिनके पास है, उन्हें और दिया जाएगा; और वे जिनके पास नही है; उनसे वह भी ले लिया जायेगा जो उनके पास है।‘‘यदि आप कृतज्ञ है तो संपन्नता आती है। और जब आप शिकायत करते हैं या असंतुष्ट होते है, तो थोड़ी सी भी शांति, प्रसन्नता या प्रेम जिसके साथ आप इस दुनिया में आये हो, वह भी समाप्त हो जाएगा। यह प्रकृति का नियम है।
इससे यह समझ में आता है कि भारत में दादी मां को यह कहने की आदत थी, ‘‘सब कुछ है। ‘‘यदि कोई वस्तु पूर्णता से कम है, तो कभी नही कहना चाहिये, ‘‘ये खाली है, हमारे पास ये नही है। ‘‘वे कहेंगे, ‘‘ये हमारे पास बहुत है। ‘‘जब आप अपने मन में पूर्ण अनुभव करते हैं; आपकी चेतना में प्रचुरता बढ़ने लगती है, और फिर प्रचुरता बढ़ती है।
ऐसा अनुभव करना ही सब कुछ नही है, यह एक दिशा है जिसमें आप बढ़ते हैं। जो कुछ भी होता है, वह बढ़ता है। आप एक बीज उगाते है और वह बढ़ता है; वह प्रचुर हो जाता है। यदि अभावग्रस्तता का बीज है तो अभावग्रस्तता बढ़ने लगती है।
अपनी आंखे खोलो और देखो आपको क्या दिया गया है! जब आपको इसका ज्ञान होता है और जब आप यह जान जाते हैं कि आपको क्या दिया गया है, आप कृतज्ञ हो जाते हैं। और कृतज्ञता में सब कुछ बढ़ने लगता है। जीवन विकसित होता है।
साम्यवाद क्यों असफल रहा? ये उनकी नीति थी जो कहती थी - जिनके पास नही है, उन्हें सब कुछ दो। इस प्रकार उनको जिनके पास नही था, दिया गया। और फिर क्या हुआ? वे और गरीब से गरीब होते गये, और भौतिक दुनिया में ऐसा होने लगा, क्योंकि विश्व चेतना में अभावग्रस्तता बढ़ने लगी।
‘‘लोग गरीब है, लोग गरीब हैं‘ ऐसा विचार विश्व चेतना में फैल गया - ये बीज वहां से उगा। बिना ज्ञान के, बिना बुद्घिमता के, कोई विकास नही होता; और यहां तक की जीवन में जो भी सौंदर्य होता है, वह भी भद्दा हो जाता है।
कृतज्ञता ज्ञान के साथ आती है। जान लो कि आप को प्रेम दिया जा रहा है। दिव्यता आपको प्रेम करती है तभी तो ये सारा ब्रह्मांड आपके लिये बनाया गया है। प्रकृति ने जो कुछ भी आपको दिया है उसके प्रति कृतज्ञ हो जाओ।
ऐसा विश्वास रखो कि पूरी रचना आपसे प्रेम करती है। जब आप के जीवन में ऐसा विश्वास आ जाता है तो जीवनपूर्ण हो जाता है। और इसी विश्वास में ज्ञान है, खुलापन है, प्रसन्नता है, सौंदर्य है। ये सब दिव्य गुण है।
23 जून को सायं 7 बजकर30 मिनट पर सीधे श्री श्री के साथ फेसबुक पर फेस 2 फेस के लिए जुड़ें।
साभारः आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।
महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।