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Kartik Purnima 2021: कार्तिक पूर्णिमा क्यों कहलाती है त्रिपुरारी पूर्णिमा,जानिए इस दिन से जुड़ी कथा और महत्व

Tue, 09 Nov 2021 11:50 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमरउजाला

सार

हिन्दी पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के 15 वें दिन कार्तिक पूर्णिमा आती पुराणों में इस दिन स्नान, व्रत व तप की दृष्टि से मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। सी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार कर दिया जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए।इसलिए इसे 'त्रिपुरारी  पूर्णिमा' भी कहते हैं।
 
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त्रिपुरारी पूर्णिमा - फोटो : istock
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विस्तार
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हिन्दी पंचांग के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के 15 वें दिन कार्तिक पूर्णिमा आती है। शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का बहुत महत्व बताया गया है। मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ से ही यह तिथि बड़ी ही खास रही है। पुराणों में इस दिन स्नान, व्रत व तप की दृष्टि से मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। इसका महत्व सिर्फ वैष्णव भक्तों के लिए ही नहीं शैव भक्तों के लिए भी बहुत अधिक है।

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वैष्णव भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि मान्यता है कि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। कहते हैं इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य यानी मछली के रूप में प्रथम अवतार लिया था। मत्स्य पुराण के अनुसार भगवान को यह अवतार वेदों की रक्षा, प्रलय के अंत तक सप्तऋषियों, अनाजों एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा के लिए लेना पड़ा था। इससे सृष्टि का निर्माण कार्य फिर से आसान हुआ। 
शिव भक्तों के अनुसार इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार कर दिया जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए।इसलिए इसे 'त्रिपुरारी  पूर्णिमा' भी कहते हैं।भगवान शिव ने कैसे किया त्रिपुरों का नाश, आइए जानते ऐन पूरी कथा -

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ब्रह्मा जी - फोटो : pinterest
ब्रह्माजी जी के वरदान से शुरू हुई ये कथा 

शिवपुराण के अनुसार, दैत्य तारकासुर के तीन पुत्र थे- तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली। जब भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो उसके पुत्रों को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने देवताओं से बदला लेने के लिए घोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया। जब ब्रह्माजी प्रकट हुए तो उन्होंने अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने के लिए कहा।
तब उन तीनों ने ब्रह्माजी से कहा कि- आप हमारे लिए तीन नगरों का निर्माण करवाईए। हम इन नगरों में बैठकर सारी पृथ्वी पर आकाश मार्ग से घूमते रहें। एक हजार साल बाद हम एक जगह मिलें। उस समय जब हमारे तीनों पुर (नगर) मिलकर एक हो जाएं, तो जो देवता उन्हें एक ही बाण से नष्ट कर सके, वही हमारी मृत्यु का कारण हो। ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया।

नगर (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला
मयदानव ने किया था त्रिपुरों(तीन नगर) का निर्माण

ब्रह्माजी का वरदान पाकर तारकाक्ष, कमलाक्ष व विद्युन्माली बहुत प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी के कहने पर मयदानव ने उनके लिए तीन नगरों का निर्माण किया। उनमें से एक सोने का, एक चांदी का व एक लोहे का था। सोने का नगर तारकाक्ष का था, चांदी का कमलाक्ष का व लोहे का विद्युन्माली का। अपने पराक्रम से इन तीनों ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। इन दैत्यों से घबराकर इंद्र आदि सभी देवता भगवान शंकर की शरण में गए। देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव मुस्कुराए और त्रिपुरों का नाश करने के लिए तैयार हो गए। देवताओं के कहने पर विश्वकर्मा ने भगवान शिव के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया।
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भगवान शिव (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
भगवान शिव ने किया त्रिपुरासुरों का संहार 

त्रिपुरों क संहार करने के लिए देवताओं ने भी अनोखा सहयोग दिया। जैसे चंद्रमा व सूर्य दिव्य रथ के पहिए बने, इंद्र, वरुण, यम और कुबेर आदि लोकपाल उस रथ के घोड़े बने। हिमालय धनुष बने और शेषनाग उसकी प्रत्यंचा। इतना ही नहीं स्वयं भगवान विष्णु बाण तथा अग्निदेव उसकी नोक बने। उस दिव्य रथ पर सवार होकर जब भगवान शिव त्रिपुरों का संहार करने के लिए बढ़ें तो दैत्यों में हाहाकर मच गया।
दैत्यों व देवताओं में भयंकर युद्ध छिड़ गया। जैसे ही त्रिपुर एक सीध में आए, भगवान शिव ने दिव्य बाण चलाकर उनका संहार कर दिया।  त्रिपुरों का अंत करने के लिए ही भगवान शिव को त्रिपुरारी भी कहते हैं। और कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही त्रिपुरों का अंत करने के कारण ही इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं। 
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