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क्यों किसी त्योहार या व्रत की तिथियां होती हैं कभी-कभी अलग ?

Wed, 28 Apr 2021 02:47 PM IST
विनोद शुक्ला पं जयगोविंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, नई दिल्ली

सार

वैष्णव संप्रदाय के साधक श्री विष्णु को ही अपना परमेश्वर मानते हैं इनके देवों में श्रीविष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण प्रमुख हैं।
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वैष्णव सूर्य पर आधारित व्रत उपवास करते हैं। ये चंदन का तिलक खड़ा लगाते हैं, वैष्णव साधुओं को महाराज, आचार्य, संत और स्वामी आदि कहा जाता है। 
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विस्तार
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सनातन धर्मावलम्बियों को आये दिन सभी त्योहारों के लिए निर्धारित मुहूर्तों के विषय को लेकर कई बार एक दिन अथवा दो दिनों के मध्य उलझना पड़ता है। कुछ विद्वानों का मत होता है कि यह तिथि आज ही है तो कुछ का मत होता है कि नहीं-नहीं यह तिथि तो कल है। विद्वानों के आपसी ज्ञान-अज्ञान में अक्सर श्रद्धालु भक्तों का ही नुकसान हो जाता है। उनकी चिंता निरंतर बनी रहती है कि असली वाली तिथि आज है या कल.? 

अधिकतर विद्वान सूर्य के उदय होने की तिथि को ही पूर्ण दिन संकल्प आदि में प्रयोग करते हैं, किंतु मुहूर्त ग्रंथों में ये पूर्णतः स्वीकार नहीं है। सर्वमान्य नियम है कि कोई भी तिथि यदि वह सूर्य के उदय होने के बाद दो घड़ी (48मिनट) से कम है तो उसे संकल्प में ग्रहण नहीं करते क्योंकि इसके लिए सूर्योदय की अवधि से वह तिथि 48 मिनट से अधिक होनी चाहिए अन्यथा संकल्प करते समय उस दिन की दोनों तिथियों का उचारण होगा। पंचांगों में अक्सर आप देखते होंगे कि स्मार्त और वैष्णव की तिथियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं। इन दोनों को स्मार्तानां और वैष्णवानां से जाना जाता है। दोनों में कुछ वैचारिक फर्क ही है।

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स्मार्त श्रद्धालु-
श्रुति एवं स्मृति में प्रतिपादित ग्रंथों के आधार पर उपासना करने वाले श्रद्धालुओं को 'स्मार्तानाम' कहा जाता है इनके मुख्य देवता शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य एवं गणेश हैं और मुख्य ग्रंथ सभी पुराण और स्मृतियां हैं। वेद ब्रह्म से विनिर्गत हुए हैं उन्हीं के द्वारा बताए गये हैं इसीलिए इन्हें 'श्रुति' ग्रंथ कहा जाता है। वेदों के अतिरिक्त सभी स्मृतियाँ एवं पुराण ग्रंथ 'स्मृति' ग्रंथ कहलाते हैं अर्थात जिस ज्ञान को परंपरा एवं स्मृतियों के आधार पर जाना गया हो, इसी ज्ञान के अनुसार आराधना करने वाले 'स्मार्त' कहे जाते हैं। इसलिए जो विष्णु को भी माने और शिव को भी, दुर्गा को भी और अन्य देवी-देवताओं का भी पूजन करें, वे सभी 'स्मार्त' संप्रदाय' के हैं। अधिकतर सनातनी 'स्मार्त' संप्रदाय के ही हैं जिसमें एकनिष्ठता का अभाव है।

वैष्णव श्रद्धालु-
वैष्णव संप्रदाय के साधक श्री विष्णु को ही अपना परमेश्वर मानते हैं इनके देवों में श्रीविष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण प्रमुख हैं। विष्णु के अन्य अवतारों तथा विष्णु से सम्बंधित तिथियाँ एकादशी, चातुर्मास, कार्तिक मास, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, होली, दीपावली आदि को भी वैष्णव धूम-धाम से मनाते हैं। वैष्णव मंदिर में विष्णु, राम और कृष्ण की मूर्तियां होती हैं ये सात्विक मंत्रों को महत्व देते है जनेऊ धारण करते हैं। पितांबरी वस्त्र पहनते हैं और हाथ में कमंडल तथा दंडी रखते हैं। वैष्णव सूर्य पर आधारित व्रत उपवास करते हैं। ये चंदन का तिलक खड़ा लगाते हैं, वैष्णव साधुओं को महाराज, आचार्य, संत और स्वामी आदि कहा जाता है। 
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