भारत में आपको हर मुहल्ले में कम से कम एक मंदिर जरूर मिल जाएगा। कारण यह है कि यहां पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों की बड़ी आबादी रहती है।
लेकिन यह अपने आप में हैरान करता है कि उन देशों में भी हिंदू देवी देवताओं और माता का मंदिर मौजूद है जो मुसलमानों का देश माना जाता है और वर्षों से यहां श्रद्घालु माता की आरती पूजा करते चले आ रहे हैं।
मुसलमानों के देश में मौजूद इन मंदिरों की कहानी भी हैरान करने वाली है।
काबुल में माता का मंदिर
अफगानिस्तान एक इस्लामिक देश माना जाता है। इस देश की राजधानी काबुल में माता का एक मंदिर स्थित है। यह मंदिर आसामाई के मंदिर के नाम से जाना जाता है।
आसामाई के विषय में यह माना जाता है कि यह उम्मीद और आसपूर्ण करने वाली देवी हैं जो आसा पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर निवास करती हैं।
माता के इस मंदिर में कई हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां हैं। इस मंदिर के पास एक बड़ी सी शिला है जिसे पंजसीर का जोगी कहा जाता है। इस जोगी की कथा यह है कि करीब 150 साल पहले यह इस स्थान पर तपस्या करने आया था।
स्थानीय लोगों ने जब इन्हें परेशान किया तब यह एक शिला के रूप में परिवर्तित हो गया। इसके बाद से यह शिला 'पंजसीर का जोगी' के नाम से जाना जाने लगा।
पाकिस्तान में देवी का प्राचीन मंदिर
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में हिंगला नदी के पास देवी का एक मंदिर है जो हिंगलाज माता के नाम से जानी जाती है। इस मंदिर को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है।
हिंगलाज देवी के विषय में ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि जो एक बार माता हिंगलाज के दर्शन कर लेता है उसे पूर्वजन्म के कर्मों का दंड नहीं भुगतना पड़ता है।
मान्यता है कि परशुराम जी द्वारा 21 बार क्षत्रियों का अंत किए जाने पर बचे हुए क्षत्रियों ने माता हिंगलाज से प्राण रक्षा की प्रार्थना की। माता ने क्षत्रियों को ब्रह्मक्षत्रिय बना दिया इससे परशुराम से इन्हें अभय दान मिल गया।
एक मान्यता यह भी है कि रावण के वध के बाद भगवान राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान राम ने भी हिंगलाज देवी की यात्रा की थी। राम ने यहां पर एक यज्ञ भी किया था।
ढाका में माता का शक्तिपीठ
बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका में माता का एक मंदिर है जो ढाकेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्घ है। इसी देवी के नाम से इस शहर का नाम ढ़ाका पड़ा है।
भारत के विभाजन से पहले यह भारत का प्रमुख मंदिर माना जाता था। इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में सेन राजवंश के राजा बल्लाल सेन ने करवाया था।
इस देवी मंदिर की गिनती शक्तिपीठ के रूप में की जाती है। इसके पीछे कथा यह है कि यहां पर देवी सती के आभूषण गिरे थे।