पुराणों में ऎसी कई कथाएं मिलती हैं जिनमें बताया गया है कि कर्म के अनुसार व्यक्ति को स्वर्ग या नर्क में स्थान मिलता है। कर्म के अनुसार ही व्यक्ति को अलग-अलग योनियों में जाना पड़ता है।
भीष्म पितामह के बारे में भी पुनर्जन्म की कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है। इनके विषय में कथा है कि भीष्म के रुप में जन्म लेने से सात जन्म पूर्व इन्होंने एक सांप को नागफनी के कांटे पर फेंक दिया था।
इससे सांप के शरीर में नागफनी के कांटे चुभ गये और वह कष्ट से मर गया। इस बात का दंड इन्हें महाभारत युद्ध के समय मिला जब अर्जुन ने अपने वाणों से इनके शरीर को छलनी कर दिया और इन्हें भी अपने शरीर में धंसे वाणों से पीड़ा भोगना पड़ा।
इसी तरह की एक घटना का उल्लेख लिंग पुराण में किया गया है।
मरने के बाद खाना पड़ा अपना ही शरीर
लिंग पुराण की कथा के अनुसार एक बड़े ही धर्मात्मा राजा थे इनका नाम था भुवनेश। इन्होंने अपने जीवन काल में खूब दान और यज्ञ किए। लेकिन इन्होंने एक ऎसी गलती की जिससे दान और यज्ञ का सारा पुण्य नष्ट हो गया।
पुण्य के नष्ट हो जाने के कारण इन्हें यमराज ने उल्लू की योनी में डाल दिया। यमराज ने राज से कहा कि उल्लू की योनी के बाद तुम्हें कुत्ते की योनी में जन्म लेना होगा।
उल्लू बना राजा एक दिन भूख प्यास से व्याकुल हो रहा था उस समय इसे अपने पूर्व जन्म का शरीर नजर आया और उसी को खाकर पेट भरना पड़ा।
लेकिन जिसे राजा भुवनेश ने दंड देकर अपने राज्य से निकाल दिया था उसी व्यक्ति ने राजा को उल्लू की योनी से मुक्ति दिलाई और कुत्ते की योनी में जन्म लेने से भी बचा लिया।
आखिर किस पाप की सजा मिली थी राजा को?
धर्मात्मा होते हुए भी राजा से एक बड़ी गलती हो गई थी इसने हरिमित्र नाम के एक व्यक्ति की संपत्ति छीन ली और उसे अपने राज्य से निकाल दिया।
हरिमित्र का कसूर यह था कि वह ब्रह्मण होते हुए भी भगवान की पूजा भजन-कीर्तन गाकर किया करता था। जबकि राजा भुवनेश ने यह घोषणा करवा दिया था कि ब्रह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भजन गाकर भगवान की पूजा नहीं करेंगे।
भगवान के भक्त को भजन गायन करने का दंड देने के कारण राजा को उल्लू और फिर कुत्ते की योनी में जन्म लेने की सजा मिली थी।
लेकिन संयोगवश जब राजा भुवनेश उल्लू बनकर अपना ही शरीर खा रहे थे तब हरिमित्र की आत्मा ने देखा कि राजा भुवनेश की दुर्दशा देखी और अपने पुण्य से राजा को यमराज की सजा से मुक्त करवा दिया। और राजा अगले जन्म में गानबंधु नामक गायक बना।
शास्त्रों में बताया गया है कि भजन कीर्तन से भगवान बहुत प्रसन्न होते हैं इसलिए जब कोई भजन कीर्तन कर रहा हो तब उसमें बाधा नहीं डाला चाहिए और न किसी के भजन कीर्तन का मजाक बनाना चाहिए।