धर्म ग्रंथों और शास्त्रों में बताया गया है कि अगर सच्ची भक्ति और सत्य और तप का पालन करें तो भक्त की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। यह बात भगवान ने द्रौपदी की लाज बचाकर साबित किया था।
द्रौपदी की ही तरह भगवान ने अपनी इस भक्तिनी की भी लाज बचाई थी जो अपने पति के साथ वन में तपस्या के लिए आई हुई थी। इस भक्तिनी का नाम था 'श्री सुरसुरी जी'।
इनके अनुपम सौन्दर्य को देखकर कुछ दुष्ट विचार वाले लोगों का मन दूषित हो गया और काम से पीड़ित होकर सुरसुरी जी के सतीत्व को नष्ट करने की ताक में रहने लगे। एक दिन जब इनके पति सुरसुरानंद जी वन में फूल और लकड़ियां लेने गए तो दुष्टों को अच्छा मौका मिल गया।
यह सीधे सुरसुरी जी के सामने कुटिया में पहुंच गए। दुष्टों ने अपनी बातों से सुरसुरी जी को बहलाने का प्रयास किया लेकिन, इनकी मनोभावना समझकर सुरसुरी जी ने भगवान राम का स्मरण करना शुरु कर दिया।
इतने में चमत्कार हुआ कि दुष्टों को सुरसुरी जी जगह आंख लाल किए हुए सिंहनी नजर आने लगी। दुष्ट जान बचाकर भाग खड़े हुए। और सती का सतीत्व कायम रहा।
इस कथा का उल्लेख गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका में किया गया है।