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Shiv Mandir : सागर की गोद में है ये शिव मंदिर,दिन में दो बार होता है गायब

Mon, 23 May 2022 07:15 PM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद

सार

मंदिर के शिवलिंग के दर्शन तभी कर सकते हैं,जब समुद्र में ज्वार कम हो। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है और मंदिर तक कोई नहीं पहुंच सकता।
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मंदिर अरब सागर के कैम्बे तट पर स्थित है। इस मंदिर की खोज लगभग 150 साल पहले हुई। मंदिर में स्थित शिवलिंग का आकार 4 फुट ऊंचा और दो फुट के व्यास वाला है।
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विस्तार
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गुजरात में शिवजी का एक ऐसा मंदिर है जिसका अभिषेक खुद समुद्र देवता करते हैं। यह मंदिर वडोदरा से 85 किमी दूर स्थित जंबूसर तहसील के कावी-कंबोई गांव में है। स्तंभेश्वर नाम का यह मंदिर दिन में दो बार सुबह और शाम को कुछ देर के लिए जलमग्न हो जाता है और कुछ देर बाद दिखाई देने लग जाता है। ऐसा ज्वार भाटा उठने के कारण होता है। इसके चलते आप मंदिर के शिवलिंग के दर्शन तभी कर सकते हैं,जब समुद्र में ज्वार कम हो। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है और मंदिर तक कोई नहीं पहुंच सकता।

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यह प्रक्रिया सदियों से चली आ रही है। मंदिर अरब सागर के कैम्बे तट पर स्थित है। इस मंदिर की खोज लगभग 150 साल पहले हुई। मंदिर में स्थित शिवलिंग का आकार 4 फुट ऊंचा और दो फुट के व्यास वाला है। इस प्राचीन मंदिर के पीछे अरब सागर का सुंदर नजारा दिखाई पड़ता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से पर्चे बांटे जाते हैं जिसमें ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है ताकि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानियों का सामना न करना पड़े।

ये है पौराणिक कथा
शिवपुराण के अनुसार,ताड़कासुर नाम के असुर ने भगवान शिव को अपनी तपस्या से प्रसन्न कर दिया था।जब शिव उसके सामने प्रकट हुए तो उसने वरदान मांगा कि उसे छह दिन की आयु का सिर्फ शिवजी का पुत्र ही मार सकेगा। शिव ने उसे यह वरदान दे दिया था। वरदान मिलते ही ताड़कासुर ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया।
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देवताओं और ऋषि-मुनियों को आतंकित कर दिया। देवताओं और ऋषि मुनियों ने शिव जी से उसका वध करने की प्रार्थना की। शिव-शक्ति से श्वेत पर्वत के कुंड में उत्पन्न हुए शिव पुत्र कार्तिकेय के 6 मस्तिष्क, चार आंख, बारह हाथ थे। कार्तिकेय ने ही मात्र 6 दिन की आयु में ताड़कासुर का वध किया था।

जब कार्तिकेय को पता चला कि ताड़कासुर भगवान शंकर का भक्त था, तो वे काफी व्यथित हुए। फिर भगवान विष्णु ने कार्तिकेय से कहा कि वे वधस्थल पर शिवालय बनवा दें, इससे उनका मन शांत होगा। कार्तिकेय ने ऐसा ही किया। सभी देवताओं ने मिलकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की, जिसे आज स्तंभेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है।मान्यता है कि स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में स्वयं शिवशंभु (भगवान शंकर) विराजते हैं इसलिए समुद्र देवता स्वयं उनका जलाभिषेक करते हैं। यहां पर महिसागर नदी का सागर से संगम होता है।

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