शिव भक्तों के लिए सावन माह सभी महीनों में सबसे पवित्र माह होता है। इसलिए इस माह को भगवान शिव की उपासना के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। भगवान शिव को भोलेनाथ, जटाधारी, शंभूनाथ, महादेव, शंकर जी आदि नामों से जाना जाता है। इनमें महादेव का एक नाम और है- नीलकंठ। भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है। उनका यह नाम क्यों पड़ा, इसके पीछे का कारण क्या है। इस संबंध में पुराणों में एक कथा का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है-
देवासुर संग्राम के समय मंथन से 14 रत्न निकले और इन्हीं रत्नों में कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं। समस्त प्राणियों में हाहाकार मच गया। देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गरमी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर, भगवान शिव विषपान के लिए तैयार हो गए। उन्होंने भयंकर विष को हथेलियों में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं।
उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया। विष के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे संसार में नीलंकठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। जिस समय भगवान शिव विषपान कर रहे थे, उस समय विष की कुछ बूंदें नीचे गिर गईं। जिन्हें बिच्छू, सांप आदि जीवों और कुछ वनस्पतियों ने ग्रहण कर लिया। इसी विष के कारण वे विषैले हो गए। विष का प्रभाव समाप्त होने पर सभी देवगण भगवान शिव की जय-जयकार करने लगे।