धार्मिक मान्यता के अनुसार भी भजन-कीर्तन के समय ताली बजाना बेहद लाभकारी माना गया है।
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प्राचीनकाल से मंदिरों में पूजा,आरती और भजन-कीर्तन आदि में सयुंक्त रूप से ताली बजाने की परंपरा रही है। आरती करते समय भी ताली बजाना बहुत शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भी भजन-कीर्तन के समय ताली बजाना बेहद लाभकारी माना गया है।
ताली बजाने का धार्मिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार ताली बजाकर हरि नाम भजने से सब पाप दूर हो जाते हैं। जैसे पेड़ के नीचे खड़े होकर ताली बजाने से पेड़ पर बैठी हुई सभी चिड़ियां उड़ जाती हैं उसी प्रकार ताली बजाकर हरि नाम लेने से देहरूपी वृक्ष से सब अविद्यारूपी चिड़ियां उड़ जाती है।
मान्यता है कि भजन, कीर्तन या आरती के दौरान ताली बजाने के माध्यम से भक्त भगवान को अपने कष्टों को सुनाने के लिए पुकारते हैं। ऐसा करने से भगवान का ध्यान भक्तों की तरफ खिंच जाता है। भजन-कीर्तन या आरती के दौरान ताली बजाने से नकारात्मकता दूर होती है, वहीं मन को शांति भी मिलती है। भजन-कीर्तन या आरती के दौरान ताली बजाने से व्यक्ति की आत्मा चेतना में रहती है और उसका ध्यान भगवान की ओर लगा रहता है।
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ऐसे हुई ताली बजाने की शुरुआत
पौराणिक कथा के अनुसार, ताली बजाने की शुरुआत भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद ने की थी। प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप को उसकी विष्णु भक्ति अच्छी नहीं लगती थी। इसे रोकने के लिए हिरण्यकश्यप ने कई प्रयास किए लेकिन प्रहलाद पर इसका कोई असर नहीं हुआ। थक-हारकर हिरणयकश्यप ने प्रहलाद के सारे वाद्य यंत्र नष्ट कर दिए। हिरण्यकश्यप को लगा कि ऐसा करने के बाद प्रहलाद भगवान विष्णु की भक्ति नहीं कर पाएगा लेकिन भक्त प्रहलाद ने भी हार नहीं मानी। वह दोनों हाथों को आपस मे पीटकर श्री हरि के भजनों को ताल देने लगा, इससे एक ताल का निर्माण हुआ जिसे ताली कहा जाने लगा। माना जाता है कि इसके बाद से ही हर भजन-कीर्तन में ताली बजाने की परंपरा शुरू हुई।
ताली बजाने का वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारी हथेलियों में कई एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स होते हैं और ताली बजाते समय हथेलियों के एक्यूप्रेशर प्वाइंट्स पर दबाव पड़ता है। जिससे शरीर की अनेकों बीमारियों में लाभ मिलता है और शरीर निरोगी बनता है,अतः ताली बजाना एक उत्कृष्ट व्यायाम है। इससे शरीर की निष्क्रियता खत्म होकर क्रियाशीलता बढ़ती है। रक्तसंचार की रूकावट दूर होकर अंग ठीक तरह से कार्य करने लगते हैं। रक्त का शुद्धिकरण बढ़ जाता है और हृदय व फेफड़ों की बीमारियां दूर होती हैं। अतः पूजा-कीर्तन में तालबद्ध तरीके से अपनी पूरी शक्ति के साथ ताली बजाएं और रोगों को दूर भगाएं। इससे तन्मय होने और ध्यान लगाने में भी सुविधा होगी।