लंका से हनुमान जी के लौटने के बाद भगवान राम ने सागर पार करने की योजना पर विचार करना शुरू कर दिया। बाल्मिकी रामायण के अनुसार भगवान राम ने सबसे पहले सागर का निरिक्षण किया की किस स्थान से पुल बनाना आसान होगा। इसके बाद पुल का निर्माण कार्य आरंभ हुआ।
लेकिन जो भी पत्थर समुद्र में डाले जाते सभी डूब जाते। इससे वानर सेना में निराशा बढ़ने लगी। तब भगवान राम ने सागर से प्रार्थना शुरू की। सागर से कहा कि वह पुल निर्माण के लिए फेंके गए पत्थरों को बांधकर रखे। लेकिन सागर ने विनती नहीं सुनी।
भगवान राम को इससे सागर पर क्रोध आ गया। राम ने अपने दिव्य वाण को जैसे ही धनुष पर चढ़ाया सागर भागकर श्री राम के चरणों में आकर गिर पड़ा और क्षमा मांगने लगा। भगवान राम ने सागर को क्षमा दान दिया। सागर ने कहा कि आपकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर हैं।
यह भगवान विश्वकर्मा के पुत्र हैं और विश्वकर्मा के समान ही शिल्पकला में निपुण हैं। इनके हाथों से पुल का निर्माण करवाइए, मैं पत्थरों को लहरों से बहने नहीं दूंगा। राम ने नल और नील के हाथों पुल निर्माण का काम शुरू करवाया। नल और नील को वरदान प्राप्त था कि उनके हाथों से फेंका गया पत्थर पानी में डूबेगा नहीं। बस फिर क्या था देखते ही देखते वानर सेना ने महज पांच दिनों में लंका तक पुल का निर्माण कर दिया।
उधर लंका में रावण इस खुशफहमी में जी रहा था कि सागर पर पुल बनाने में राम असफल होंगे लेकिन जब राम के पुल बनाकर लंका पहुंचने की खबर जब रावण को मिली तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। रावण को लगने लगा कि अब युद्घ निश्चित है इसलिए सेना तैयार करने में जुट गया। कल पढ़िए रावण कहां रखता था अपना पुष्पक विमान