श्राद्धपर्व आरम्भ हो चुका है, इस अवधि में पितृलोक से सभी पितर पृथ्वी लोक में अपने-अपने परिजनों के यहां पधारकर उनके द्वारा किए गए श्राद्ध-तर्पण आदि का भोग करते हैं। जो प्राणी इस पक्ष में श्रद्धा भाव से अपने पूर्वजों का तिलांजलि पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराता है उनके पितृ प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देकर अमावस्या के दिन अपने-अपने लोक चले जाते हैं। श्राद्ध न करने वालों अथवा इसका उपहास उड़ाने वालों के पितृ उनका ही रक्तपान करते हैं, जिसके कारण पूरे परिवार को नाना प्रकार की व्याधियां घेरे रहती हैं उनके घर दरिद्रता व्याप्त रहती है। ब्रह्म पुराण में तो यहां तक कहा गया है कि, 'श्राद्धं न कुरुते मोहात तस्य रक्तं पिबन्ति ते।अर्थात जो संताने अमावस्या तक के मध्य अपने पितरों का श्राद्ध-तर्पण आदि नहीं करते उनके पितर श्राद्ध की प्रतीक्षा करके अपने परिजनों को श्राप देकर पुनः पितृ लोक चले जाते हैं।
श्राद्धकर्म के द्वारा ही प्राणी पितृऋण से मुक्त हो सकता है इसीलिए शास्त्रों में श्राद्ध करने की अनिवार्यता कही गई है। जीव मोहवश इस जीवन में पाप-पुण्य दोनों कृत्य करता है। पुण्य का फल स्वर्ग है और पाप का नर्क। जन्म-जन्मांतर में अपने किए हुए शुभा-शुभ कर्मफल के अनुसार स्वर्ग-नरक का सुख भोगने के बाद जीवात्मा पुनः चौरासी लाख योनियों की यात्रा पर निकल पड़ती है अतः पुत्र-पौत्रादि का यह कर्तव्य होता है कि वे अपने माता-पिता तथा पूर्वजों के निमित्त श्रद्धा पूर्वक ऐसे शास्त्रोक्त कर्म करें जिससे उन मृत प्राणियों को परलोक में भी सुख प्राप्त हो सके। शास्त्रों में मृत्यु पश्च्यात और्ध्व दैहिक संस्कार, पिण्डदान, तर्पण, श्राद्ध, एकादशाह, सपिण्डीकरण, अशौचादि निर्णय, कर्मविपाक आदि के द्वारा पापों के विधान का प्रायश्चित कहा गया है।
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श्राद्ध कैसे करें?
जिस दिन आपके पितृ की श्राद्ध तिथि हो उस दिन सूर्योदय से लेकर दोपहर तक की अवधि के मध्य ही पितरों के निमित्त श्राद्ध-तर्पण आदि करें। इसके लिए दूध, गंगाजल, मधु, वस्त्र, कुश, तिल अभिजित मुहूर्त मुख्य रूप से अनिवार्य तो है ही तुलसीदल से भी पिंडदान करने से पितर पूर्णरूप से तृप्त होकर कर्ता को आशीर्वाद देते हैं। तर्पण के समय सर्वप्रथम निमंत्रित ब्राह्मण का पैर धोना चाहिए। इस कार्य के समय पत्नी को दाहिनी तरफ होना चाहिए। जिस दिन पितरों का श्राद्ध करना हो उस तिथि के दिन तेल लगाने, दूसरे का अन्न खाने से बचना करना चाहिए।
पितृ गायत्री और पंचबलि मंत्र
पितृपक्ष में अथवा प्राणियों की मृत्यु के पश्च्यात पितृ गायत्री मंत्र का जप करने अथवा करवाने से पितरों की आत्मा तृप्त हो जाती है।
अतः यथा संभव यह पितृ गायत्री मंत्र- ऊं देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम: ।। करवाकर कर गौ, श्वान, कौए, देव और चींटी के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें।
गोबलि- गाय के लिए पत्तेपर 'गोभ्ये नमः' मंत्र पढ़कर भोजन सामग्री निकालें।
श्वानबलि- कुत्ते के लिए भी 'द्वौ श्वानौ' नमः मंत्र पढकर भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें।
काकबलि- कौए के लिए 'वायसेभ्यो' नमः' मंत्र पढकर पत्ते पर भोजन सामग्री निकालें।
देवबलि- देवताओं के लिए 'देवादिभ्यो नमः' मंत्र पढकर भोजन सामग्री पत्तल पर निकालें।
चींटियों के लिए- 'पिपीलिकादिभ्यो नमः' मंत्र पढकर चींटियों के लिए भोजन सामग्री पत्तेपर निकालें।
दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके कुश, तिल और जल लेकर हथेली में स्थित पितृतीर्थ से संकल्प करें तथा एक या तीन ब्राह्मण को भोजन कराएं यथा शक्ति दक्षिणादि देकर निमंत्रित ब्राह्मण की चार बार प्रदक्षिणा करें। जो प्राणी श्रद्धापूर्वक ऐसा करके पितरों को तृप्त कर देगा उसके पितृ आशीर्वाद देने के लिए विवश हो जायेंगे जिसके फलस्वरूप कार्य व्यापार, शिक्षा अथवा वंश बृद्धि में आ रही रुकावटें भी दूर हो जायेंगी।