दुर्गा सप्तशती के पहले अध्याय में वर्णन किया गया है कि देवी योगमाया ने ही इस संसार को मोह माया में डाल रखा है। देवी योग माया भगवान विष्णु के साथ-साथ रहती हैं और हमेशा इनकी सहयता करती हैं।
जब भगवान श्री कृष्ण ने कंश के कारागृह में जन्म लिया तब देवी योगमाया ने भी देवी यशोदा के गर्भ से जन्म लिया। श्री कृष्ण के पिता वासुदेव जब नंद बाबा के पास नवजात श्री कृष्ण को लेकर पहुंचे तब नंद बाबा ने योगमाया को वासुदेव को सौंप दिया।
कंश ने योगमाया को देवकी की आठवीं संतान समझकर जब भूमि पर पटकना चाहा तब देवी कंश के हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और अष्टभुजा रूप धारण करके कंश को चेतावनी देते हुए बोली की 'तेरे काल का जन्म हो चुका है, शीघ्र ही वह तुम्हारा वध करेगा।'
जिस स्थान पर देवी योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था वह स्थान आज भी वज्रभूमि के महावन में मौजूद है। महावन की पहाड़ी पर एक किला बना हुआ है जिसे नंद किला कहा जाता है। इस किला में एक छोटी कोठरी बनी हुई है। माना जाता है कि इसी कोठरी में यशोदा ने देवी योग माया को जन्म दिया था।